ग्लैमर छोड़ ज़मीन की सियासत तक : डॉ. दिव्यानी कटारा का बेबाक इंटरव्यू—बाप के उभार से लेकर पर्ची सरकार तक

 

उदयपुर। राजनीति की पटकथा में जब कोई नया किरदार प्रवेश करता है, तो वह केवल संवाद नहीं लाता, अपने साथ एक पूरा दृष्टिकोण लेकर आता है। मेवाड़ की राजनीति में डॉ. दिव्यानी कटारा का आगमन कुछ ऐसा ही है—जहाँ ग्लैमर की रोशनी से निकलकर वे ज़मीन की धूल में अपने सवाल और जवाब तलाश रही हैं।

सवाल : आपने ग्लैमर की दुनिया छोड़कर राजनीति का कठिन रास्ता क्यों चुना?

डॉ. दिव्यानी कटारा : “मुंबई की चमक-दमक में सब कुछ था, लेकिन अपने समाज के दर्द को समझने का अवसर नहीं था। मैंने सोचा कि अगर बदलाव लाना है, तो ज़मीन पर उतरना होगा। इंदिरा गांधी मेरी प्रेरणा हैं—उनकी तरह मजबूत निर्णय लेने की कोशिश कर रही हूँ।”

यह जवाब किसी फिल्म के उस सीन जैसा लगता है, जहाँ नायिका अपने भीतर की पुकार सुनकर जीवन की दिशा बदल देती है—संघर्ष को अपनाते हुए।

सवाल : मेवाड़ में भारत आदिवासी पार्टी (‘बाप’) का उभार आप कैसे देखती हैं?

डॉ. दिव्यानी कटारा : “यह उभार अचानक नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों की गलतियों का परिणाम है। जनता पुराने चेहरों से थक चुकी थी। लेकिन हम उन्हें विरोधी नहीं, अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं—भविष्य में साथ आने की संभावनाएँ खुली हैं।”

यह उत्तर राजनीति की उस सूक्ष्म कूटनीति को दर्शाता है, जहाँ आलोचना और संभावना एक ही फ्रेम में दिखाई देती हैं।

सवाल : उदयपुर लोकसभा चुनाव में हार को आप कैसे देखती हैं?

डॉ. दिव्यानी कटारा: “वागड़-मेवाड़ का भील समाज बाहरी लोगों को सहज स्वीकार नहीं करता। यह सामाजिक वास्तविकता है, जिसे समझना जरूरी है।”

यहां उनका लहजा विश्लेषणात्मक हो जाता है—मानो वे केवल नेता नहीं, समाज की गहरी परतों को पढ़ने वाली पर्यवेक्षक भी हों।

सवाल : वर्तमान सरकार पर आपके आरोप काफी तीखे हैं—‘पर्ची सरकार’ कहना क्या संकेत देता है?

डॉ. दिव्यानी कटारा : “भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में जो व्यवस्था चल रही है, उसमें पारदर्शिता की कमी है। जनता का विकास नहीं, बल्कि शोषण ज्यादा दिखाई देता है—इसलिए मैंने इसे ‘पर्ची सरकार’ कहा।”

यह बयान किसी प्रभावशाली फिल्मी डायलॉग की तरह है—सीधा, तीखा और ध्यान खींचने वाला।

सवाल : सलूंबर में बच्चों की मौत के मामले पर आपका क्या रुख है?

डॉ. दिव्यानी कटारा : “यह बेहद दुखद घटना है। मैं पूरे मामले का अध्ययन कर रही हूँ। जहाँ भी प्रशासनिक कमी दिखेगी, वहाँ मैं सड़क पर उतरकर जनता के हक के लिए लड़ाई लड़ूँगी।”

इस जवाब में संवेदनशीलता और संघर्ष दोनों की झलक है—जैसे कहानी अपने भावनात्मक चरम की ओर बढ़ रही हो।

अंततः, यह इंटरव्यू एक ऐसी राजनीतिक यात्रा की झलक देता है, जो अभी शुरुआती दौर में है। डॉ. दिव्यानी कटारा के पास संवाद हैं, दृष्टि है और संघर्ष का दावा भी। लेकिन राजनीति की असली कसौटी वही है, जो हर फिल्म के क्लाइमेक्स में होती है—क्या नायक अपने वादों को हकीकत में बदल पाता है, या कहानी केवल शब्दों तक सीमित रह जाती है।

 

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