
उदयपुर। गीतांजली डेंटल कॉलेज में आयोजित ‘सृजन 2025’ बीडीएस ओरिएंटेशन डे एक भव्य आयोजन तो रहा, लेकिन पूरे कार्यक्रम की संरचना और संदेश में वही पारंपरिक औपचारिकता दिखाई दी, जो अक्सर उच्च शिक्षा संस्थानों के उत्सवमूलक कार्यक्रमों में देखी जाती है। दीप प्रज्ज्वलन और इनवोकेशन सेरेमनी जैसे औपचारिक तरीकों से शुरुआत तो उत्साहपूर्ण थी, पर भव्यता के बीच यह भी प्रश्न खड़ा हुआ कि क्या ये प्रतीकात्मक क्रियाएँ वास्तव में शिक्षा की गुणवत्ता को परिभाषित करती हैं, या फिर केवल एक स्थापित परंपरा का निर्वाह मात्र हैं?

प्रिंसिपल डॉ. बालाजी मनोहर का संबोधन सुव्यवस्थित और सूचनापूर्ण था, लेकिन वही नियम-विनियम, अनुशासन और एंटी-रैगिंग पॉलिसी की बातें—जो हर संस्थान अपने हर बैच को दोहराता है—फिर से एक बार औपचारिकता जैसी प्रतीत हुई। यह दिखा कि संस्थान की “उच्च शैक्षणिक परंपराएँ” बताने के बजाय यह स्पष्ट किया जा सकता था कि यह परंपरा वास्तव में कैसे बनी, और विद्यार्थी इससे किस प्रकार लाभान्वित हुए।
अंकित अग्रवाल का संबोधन: उपलब्धियां या अधूरी सच्चाइयां?
एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अंकित अग्रवाल ने संस्थान की प्रगति पर प्रकाश डाला, लेकिन उपलब्धियों की सूची में एक बात लगातार उभरकर सामने आई—संख्या, तकनीक और अधोसंरचना पर अत्यधिक निर्भरता।
उन्होंने बताया कि 2014 से अब तक 500+ अंडरग्रेजुएट और 30+ पोस्टग्रेजुएट छात्र निकल चुके हैं। यह संख्या पहली नज़र में प्रभावशाली लग सकती है, लेकिन आलोचनात्मक प्रश्न वहीं खड़ा होता है—इन विद्यार्थियों की वास्तविक गुणवत्ता, उनकी क्लीनिकल दक्षता, और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके योगदान का मूल्यांकन कहां है? केवल संख्या उपलब्धि नहीं मानी जा सकती।
डिजिटल डेंटिस्ट्री, AI डायग्नोसिस, CAD/CAM और 3D प्रिंटिंग जैसी उन्नत तकनीकों को “जल्द शामिल करने की योजना” दर्शाती है कि संस्थान अभी भी इन आधुनिक सुविधाओं के पूर्ण एकीकरण से दूरी पर है। वर्षों से निजी मेडिकल व डेंटल संस्थान तकनीक आधारित शिक्षा की बात तो करते हैं, लेकिन ज़मीनी रूप में इन तकनीकों का उपयोग अक्सर बहुत सीमित पाया जाता है।
स्मार्ट क्लासरूम, आउटडोर स्टेडियम और निर्माणाधीन इनडोर स्टेडियम जैसे बुनियादी ढाँचे की जानकारी भी उत्साहजनक जरूर है, पर शिक्षा की वास्तविक कसौटी क्लिनिकल ट्रेनिंग, इंटर्नशिप की गुणवत्ता, और रिसर्च आउटपुट होती है—जिस पर कार्यक्रम में एक भी आलोचनात्मक या व्यावहारिक चर्चा नहीं हुई।
अग्रवाल ने ERP सिस्टम के माध्यम से अभिभावकों को “रियल टाइम अपडेट” देने की बात कही, लेकिन यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या शिक्षा को इतनी निगरानी-आधारित संरचना की आवश्यकता है, जहाँ विद्यार्थी का हर कदम अभिभावकीय नियंत्रण में हो? क्या इससे स्वायत्तता कम नहीं होती?
उनका प्रेरणादायी संदेश शुभकामनाओं के साथ समाप्त जरूर हुआ, पर उसमें आलोचना या आत्ममूल्यांकन का स्थान लगभग न के बराबर था, जो किसी भी उन्नति के लिए आवश्यक होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और वाइट कोट सेरेमनी
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और वाइट कोट सेरेमनी को “गरिमामयी” बताया गया, परंतु यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि वाइट कोट सेरेमनी के वास्तविक मायने—मेडिकल एथिक्स, समाज के प्रति ज़िम्मेदारी, और पेशे की शुचिता—कार्यक्रम में सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रह गए। विद्यार्थियों को कोट पहनाने के पीछे की गहरी नैतिकता पर कम और समारोह के बाहरी आकर्षण पर अधिक ध्यान दिया गया।
समापन : उत्साह तो है, पर आत्ममंथन कहां?
एडिशनल प्रिंसिपल डॉ. नमित नागर ने सभी का धन्यवाद किया, पर कार्यक्रम का पूरा स्वर एकतरफा उत्सवधर्मिता से भरा रहा। कहीं भी यह चर्चा नहीं हुई कि—पाठ्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर से कितना मेल खाता है? रिसर्च संस्कृति कितनी मजबूत है?
विद्यार्थियों को वास्तविक दुनिया की क्लीनिकल चुनौतियों के लिए कैसे तैयार किया जाएगा? और संस्थान की पूर्व बैचों के वास्तविक अनुभव क्या रहे?
अंततः ‘सृजन 2025’ उत्साह, ऊर्जा और शुभकामनाओं से भरा आयोजन जरूर था, लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इसमें वह ईमानदार आत्मविश्लेषण और मूलभूत शैक्षणिक विमर्श अनुपस्थित था, जो किसी भी पेशेवर संस्थान को उत्कृष्टता की ओर ले जाता है।
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