
उदयपुर। लेक सिटी उदयपुर में मानसून की दस्तक के साथ ही बिजली विभाग (डिस्कॉम) की पुरानी ‘बीमारी’ फिर उभर आई है। हर साल प्री-मानसून मेंटेनेंस (बारिश से पूर्व मरम्मत) के नाम पर शहर के विभिन्न इलाकों में घंटों घोषित और अघोषित बिजली कटौती की जाती है। आम जनता इस उम्मीद में घंटों उमस और गर्मी झेलती है कि बारिश के दिनों में उन्हें निर्बाध बिजली मिलेगी। लेकिन जैसे ही आसमान में पहली मानसूनी घटा छाती है या हल्की बूंदाबांदी होती है, पूरे शहर की बत्ती गुल हो जाती है। ऐसे में जागरूक उदयपुरवासियों ने अब बिजली विभाग के इस तथाकथित ‘मेंटेनेंस’ पर गंभीर आलोचनात्मक सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर इंजीनियर बारिश से पहले मरम्मत के नाम पर क्या करते हैं और धरातल पर उसकी हकीकत क्या है:
नाम ‘मरम्मत’ का, हकीकत सिर्फ पेड़ों की छंटाई तक सीमित!
बिजली निगम के अनुसार, बारिश से पहले हर सब-स्टेशन और फीडर पर बड़े पैमाने पर तकनीकी सुधार किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह मेंटेनेंस केवल बिजली की लाइनों के पास आ रहे पेड़ों की टहनियों को काटने (ट्री-कटिंग) तक ही सिमट कर रह जाता है।
इंजीनियरों का दावा : हम इंसुलेटर बदलते हैं, ट्रांसफार्मर का लोड बैलेंस करते हैं, जंपर्स को टाइट करते हैं और ढीले तारों को कसते हैं ताकि तेज हवा या बारिश में फॉल्ट न हो।
धरातल का कड़वा सच: यदि यह सब काम पूरी ईमानदारी और तकनीकी बारीकी से किया जाता है, तो मात्र 10 से 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवा या हल्की फुहारों के आते ही फीडर क्यों ट्रिप हो जाते हैं? क्यों इंसुलेटर कड़कड़ाकर जल जाते हैं? साफ है कि मेंटेनेंस के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति और रस्म अदायगी की जा रही है।
घंटों बिजली बंद रखने के पीछे का ‘इंजीनियरिंग’ शॉर्टकट
उदयपुर के भूपालपुरा, हिरणमगरी, सवीना, पुराना शहर और कोर्ट चौराहे जैसे व्यस्त इलाकों में प्री-मानसून के नाम पर 4 से 6 घंटे तक लगातार बिजली बंद रखी जाती है। इस शटडाउन के पीछे डिस्कॉम के पास एक ही घिसा-पिटा तर्क होता है—”कर्मचारियों की सुरक्षा और लाइनों का सुदृढ़ीकरण।”
लेकिन जानकारों और सजग नागरिकों का आरोप है कि इंजीनियर आधुनिक उपकरणों और पर्याप्त मानव संसाधन के अभाव में ‘शॉर्टकट’ रास्ता अपनाते हैं। फॉल्ट को ढूंढने और उसे स्थायी रूप से ठीक करने के बजाय केवल काम चलाऊ मरम्मत की जाती है। घंटों शटडाउन लेने के बावजूद जब बारिश के दौरान फॉल्ट आता है, तो विभाग के पास एक ही बहाना होता है कि “मौसम खराब है, इसलिए टीम लाइन पर नहीं चढ़ सकती।”
जनता की मांग: जवाबदेही तय करे प्रशासन
उदयपुर की जनता अब इस ‘शटडाउन’ के खेल से पूरी तरह आजिज आ चुकी है। पर्यटन नगरी होने के नाते अघोषित बिजली कटौती से न केवल आम जनता, बल्कि यहाँ आने वाले सैलानी और स्थानीय व्यापार भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
बड़ा सवाल: जब मार्च से लेकर मई तक हर हफ्ते मेंटेनेंस के नाम पर कटौती की गई, तो जून की पहली बारिश में ही सिस्टम पूरी तरह ‘कोलैप्स’ (धराशायी) कैसे हो गया? क्या अधिकारियों की इस लापरवाही और गलत प्लानिंग की कोई जवाबदेही तय होगी?
क्षेत्रवासियों ने जिला प्रशासन और ऊर्जा विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि प्री-मानसून मेंटेनेंस के नाम पर जनता को परेशान करने वाले इंजीनियरों और ठेकेदारों के काम का ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ (निष्पक्ष जांच) कराया जाए, ताकि यह साफ हो सके कि बंद के दौरान वास्तव में तकनीकी काम हुआ भी था या सिर्फ उपभोक्ताओं को अंधेरे में रखा गया।
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