स्मार्ट सिटी उदयपुर कॉकरोच का अभेद्य गढ़? रेंगती व्यवस्था का पोस्टमार्टम

उदयपुर

कहते हैं कि दुनिया से डायनासोर खत्म हो गए, बड़े-बड़े हिमयुग बीत गए, लेकिन 32 करोड़ साल पुराना एक जीव आज भी हर नाली, हर कोने और हर गंदगी में जिंदा है—वह है कॉकरोच। इस जीव की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह हर विपरीत परिस्थिति को पचा जाता है। अगर आप झीलों की नगरी और ‘स्मार्ट सिटी’ उदयपुर की मौजूदा व्यवस्था को देखें, तो आपको समझ आएगा कि यहां सिस्टम ने भी सर्वाइवल (जीवित रहने) की इसी कला को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। ऐसी ही व्यवस्था के खिलाफ सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी की धूम मची है। हालांकि सोशल मीडिया पर चल रहा यह अभियान पूरी तरह से मौजूदा राजनीति व सिस्टम की मुखालफत कर रहा है।

बहरहाल उदयपुर में भी विकास के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। आइए, इस तथाकथित स्मार्ट सिटी की बदहाली को कॉकरोच की लाइफ साइकिल (जीवन चक्र) के चश्मे से देखते हैं।

1. ऊथेका (अंडे का आवरण) – बंद कमरों की स्मार्ट प्लानिंग और वादों का गर्भकाल

कॉकरोच की लाइफ साइकिल की शुरुआत ‘ऊथेका’ यानी एक सख्त खोल से होती है, जिसमें दर्जनों अंडे महफूज रहते हैं। उदयपुर के संदर्भ में यह ऊथेका और कुछ नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट’ की वो बंद कमरों वाली फाइलें और योजनाएं हैं, जिन पर करोड़ों रुपये के बजट का ब्लूप्रिंट तैयार होता है।

इस खोल के भीतर भ्रष्टाचार और कागजी विकास के अंडे पलते हैं। बाहर से जनता को लगता है कि शहर ‘स्मार्ट’ हो रहा है, लेकिन इस सख्त प्रशासनिक खोल के अंदर सिर्फ बजट को डकारने की छटपटाहट चल रही होती है। यह आवरण नेताओं और अधिकारियों को जनता के तीखे सवालों से तब तक बचा कर रखता है, जब तक कि बजट धरातल पर आकर ‘कचरा’ न बन जाए।

2. निम्फ (अप्सरा) – उबड़-खाबड़ चैंबर और केंचुल बदलती व्यवस्था

जब अंडे से नन्हा ‘निम्फ’ बाहर आता है, तो वह वयस्क बनने तक कई बार अपनी त्वचा (केंचुल) बदलता है। हर बार त्वचा बदलने पर वह सफेद और साफ दिखता है, लेकिन वक्त के साथ उसका बाहरी कवच और कठोर होता जाता है।

उदयपुर की सड़कों पर बने नालियों, सीवरेज और बिजली के उबड़-खाबड़ चैंबर ठीक इसी निम्फ अवस्था में हैं। हर चुनाव से पहले पैचवर्क करके इन्हें ‘सफेद और साफ’ (नया) दिखाने की कोशिश की जाती है, लेकिन कुछ ही दिनों में नेताओं की केंचुल उतरती है और सड़कों का पुराना, कठोर और बदसूरत रूप फिर बाहर आ जाता है। दिन में 5 से 10 बार गुल होती बिजली और मुख्य मार्गों पर लटकते पुराने खंभे व तार गवाह हैं कि बिजली कंपनियां और नगर निगम अपनी त्वचा तो बदल रहे हैं, लेकिन अंदर का सिस्टम वही पुराना और जर्जर है।

3. वयस्क कॉकरोच – हर गंदगी को पचाने की क्षमता

एक वयस्क कॉकरोच पूरी तरह सर्वाहारी होता है। वह बासी खाने से लेकर कागज के टुकड़ों तक, सब कुछ खाकर जिंदा रह सकता है। उसे गंदा, नम और अंधेरा माहौल सबसे ज्यादा पसंद आता है।

उदयपुर नगर निगम पर पिछले 30 सालों से बीजेपी का जो अटूट कब्जा है, वह इसके वयस्क होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। मौजूदा सिस्टम में राजनेता और प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह सर्वाहारी हो चुके हैं। इन्हें शहर की जनता की तकलीफों से कोई फर्क नहीं पड़ता। ट्यूबवैलों और जलापूर्ति की लाइनों में सीवरेज का गंदा पानी मिक्स हो रहा है, लोग बीमार हो रहे हैं, लेकिन यह तंत्र इस ‘गंदगी’ को भी आसानी से पचा जाता है।

आयड़ नदी के सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये का जो ‘फिजूलखर्च’ किया जा रहा है, वह कुछ और नहीं बल्कि इस वयस्क तंत्र के लिए भोजन (मलाई) की व्यवस्था है। नदी साफ हो न हो, लेकिन इस तंत्र का पेट जरूर भर जाता है।

ट्रैफिक पुलिस का चरित्र : ‘अंधेरे के शूरवीर’

कॉकरोच की एक और फितरत होती है—उसे रोशनी से नफरत होती है, वह अंधेरे कोनों में छिपकर शिकार करता है। उदयपुर का ट्रैफिक सिस्टम इसका सटीक उदाहरण है। शहर के चौराहे जाम से कराहते रहते हैं, गाड़ियां रेंगती हैं, लेकिन आपको कोई पुलिसकर्मी इस जाम को सुलझाते (रोशनी में काम करते) हुए नहीं दिखेगा। इसके उलट, वे किसी पेड़ या मोड़ के ‘अंधेरे कोने’ में छिपकर खड़े मिलेंगे, जहां उनका पूरा ध्यान सिर्फ वाहन चालकों का चालान काटने (शिकार करने) पर होता है। व्यवस्था सुधरे न सुधरे, टारगेट पूरा होना चाहिए।

32 करोड़ साल पुराने कॉकरोच को आप चाहे जितने कीटनाशक छिड़क कर मारने की कोशिश करें, वह किसी न किसी दरार से वापस निकल आता है। उदयपुर की जनता भी पिछले तीन दशकों से बदलाव की उम्मीद में बैठी है, लेकिन ‘राजनीति’ की यह लाइफ साइकिल इतनी मजबूत हो चुकी है कि यह हर पांच साल बाद नया रूप धरकर सत्ता की चौपाल पर रेंगने लगती है। जब तक जनता इस राजनीतिक लाइफ साइकिल को वोट की चोट से पूरी तरह ध्वस्त नहीं करेगी, तब तक उदयपुर सिर्फ कागजों पर ही स्मार्ट रहेगा, और जमीन पर जनता सीवरेज मिला पानी पीने और जाम में फंसने को मजबूर रहेगी।

 

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