
उदयपुर। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ के प्रतापनगर स्थित महाराणा प्रताप खेल मैदान पर मंगलवार को वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती की पूर्व संध्या पर एक विशेष नमन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत, कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर, पीठ स्थविर डॉ. कौशल नागदा और रजिस्ट्रार डॉ. तरुण श्रीमाली के सानिध्य में तीनों परिसरों के डीन, डायरेक्टर और कार्यकर्ताओं ने महाराणा प्रताप की अश्वारूढ़ (घोड़े पर सवार) प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।
हल्दीघाटी का युद्ध स्वतंत्रता बनाम साम्राज्यवाद था : प्रो. सारंगदेवोत
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने महाराणा प्रताप के ऐतिहासिक योगदान को याद किया। उन्होंने कहा, “इतिहास में स्वाधीनता का बिगुल फूंकने वालों में सबसे पहला नाम महाराणा प्रताप का आता है। उनका एकमात्र ध्येय अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखना था और हल्दीघाटी का युद्ध वास्तव में ‘स्वतंत्रता बनाम साम्राज्यवाद’ का मुकाबला था।”
प्रो. सारंगदेवोत ने आगे कहा कि मेवाड़ की इस पावन धरा से महाराणा प्रताप ने वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा, सर्वधर्म समभाव और विश्व शांति का जो संदेश दिया था, उसे वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाना बेहद जरूरी है ताकि एक अपराध मुक्त समाज का निर्माण किया जा सके। उन्होंने युवाओं से प्रताप के आत्मसम्मान, देशप्रेम और वीरता से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।

मुगलों के दौर में प्रताप ने किया मानवाधिकारों के लिए संघर्ष : भंवर लाल गुर्जर
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि महाराणा प्रताप ने अपने पूरे जीवन में कभी भी अधीनता स्वीकार नहीं की और धर्म व मातृभूमि की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्होंने मुगलों के शासनकाल में ही मानवाधिकारों के लिए लड़ाई का सूत्रपात किया था। इस स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने समानता का रास्ता अपनाया, यही वजह थी कि उनकी सेना में समाज के सभी वर्गों का समान प्रतिनिधित्व था।
इस गौरवमयी अवसर पर प्रो. मलय पानेरी, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. जीवनसिंह खरकवाल, प्रो. मंजू मांडोत, परीक्षा नियंत्रक प्रो. पारस जैन, प्रो. युवराज सिंह राठौड़ सहित विद्यापीठ के सैकड़ों कार्यकर्ताओं और प्रबुद्धजनों ने भी प्रताप को नमन कर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
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