
उदयपुर। झीलों की नगरी में इन दिनों पर्यटन की नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘फिल्म’ की चर्चा है जिसकी स्क्रिप्ट ने भाजपा के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। यह कहानी किसी हॉलीवुड थ्रिलर या कुख्यात ‘एप्सटीन फाइल्स’ से कम नहीं लग रही—जहाँ कुछ पन्ने तो खुले हैं, लेकिन सच्चाई की पूरी किताब अभी बंद है। चर्चाएं आम हैं कि इस कांड के तार उदयपुर की गलियों से निकलकर जयपुर और दिल्ली के सत्ता केंद्रों तक जुड़े हैं।
मामले की शुरुआत एक महिला भाजपा नेता द्वारा एक वकील के खिलाफ दर्ज कराई गई FIR से हुई। लेकिन जिसे महज एक कानूनी विवाद समझा जा रहा था, उसने तब विकराल रूप ले लिया जब पुलिस ने आधी रात को वकील के घर दबिश दी। सूत्रों की मानें तो यह मामला सिर्फ एक शिकायत तक सीमित नहीं है; यह कहानी ‘मोहब्बत, जालसाजी और फिर ब्लैकमेलिंग’ के खतरनाक कॉकटेल से बनी है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, नए-नए किरदारों की एंट्री हो रही है और भाजपा के कई रसूखदार पदाधिकारी अब ‘कटघरे’ में खड़े नजर आ रहे हैं।
नगर निगम चुनाव दहलीज पर हैं और ऐसे में इस कांड ने पार्टी की साख पर बट्टा लगा दिया है। अब पार्टी उस मोड़ पर है जहाँ ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ वाली रणनीति पर काम चल रहा है।
अपनों पर ही वार : पूर्व जिलाध्यक्ष मांगीलाल जोशी का वीडियो संदेश इस बात की तस्दीक करता है कि पार्टी के भीतर ही ‘विभीषण’ सक्रिय हैं। उन्होंने साफ कहा, “कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा के ही कुछ लोग पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं।”
दिल्ली-जयपुर की नजर : स्थिति को बिगड़ता देख प्रदेश नेतृत्व अब स्थानीय कार्यकारिणी की शक्तियों को सीमित कर एक ‘संयोजक’ नियुक्त करने की तैयारी में है, ताकि डैमेज को रोका जा सके।
भीतरखाने हलचल : बताया जा रहा है कि कुछ नेताओं ने बंद कमरों में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है और इस्तीफे की पेशकश भी हुई है।
खाकी पर सवाल : आधी रात का ‘सस्पेंस’ और वो ‘सूट-बूट’ वाला शख्स
11 फरवरी की रात करीब 3 बजे आरोपी वकील विशाल गुर्जर के घर हुई छापेमारी के सीसीटीवी फुटेज ने पुलिस की कार्यशैली को संदिग्ध बना दिया है।
सब्बल और हथौड़े वाले ‘अज्ञात’ : वीडियो में पुलिस के साथ कुछ नकाबपोश युवक भारी हथौड़े और सब्बल लिए दिख रहे हैं। सवाल यह है कि वर्दी के साथ ये ‘सिविलियन’ गुंडे कौन थे?
मिस्ट्री मैन : रात के अंधेरे में पुलिस अधिकारियों के बीच एक छोटा कद का व्यक्ति ‘सूट-बूट’ पहने घूम रहा है। डीएसपी स्तर के अधिकारी इस व्यक्ति की पहचान से इनकार कर रहे हैं, जो दाल में कुछ काला होने का पुख्ता संकेत है।
सियासी दबाव का साया : बचाव पक्ष के वकीलों का कहना है कि केस दर्ज होते ही जांच की कमान आनन-फानन में एएसआई से छीनकर डिप्टी को सौंपना सामान्य नहीं है। क्या पुलिस किसी अदृश्य ‘पावर सेंटर’ के इशारे पर काम कर रही थी?
अभी तो सिर्फ ट्रेलर है…
आरोपी विशाल गुर्जर फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे है, लेकिन शहर की हवाओं में तैरते सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे। क्या पुलिस उन ‘बड़े नामों’ तक पहुँच पाएगी जिनका जिक्र हवाओं में है? या फिर इस फाइल को भी ‘एप्सटीन फाइल्स’ की तरह ही चुनिंदा खुलासों के साथ रफा-दफा कर दिया जाएगा?
उदयपुर की जनता और भाजपा के कार्यकर्ता अब उस एक्शन का इंतज़ार कर रहे हैं, जो न्याय की कसौटी पर खरा उतरे।
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