
उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रोफेसर सुनीता मिश्रा का इस्तीफा ऐसे माहौल में स्वीकार किया गया है, जहाa विश्वविद्यालय लगातार राजनीतिक दबाव, छात्र आंदोलनों और प्रशासनिक विवादों से घिरा रहा। गजल की यह पंक्ति-बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले—इस पूरे प्रकरण की विडंबना को और गहरा करती है, क्योंकि यह इस्तीफा एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया से ज्यादा एक ऐसी कहानी का हिस्सा है जिसमें आरोप, प्रतिक्रियाएं, राजनीतिक हस्तक्षेप और अकादमिक स्वतंत्रता सब उलझे दिखाई देते हैं।
राज्यपाल हरिभाऊ किशनराव बागडे ने गुरुवार को मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। राजभवन की ओर से जारी पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि कुलगुरु के खिलाफ मिली विभिन्न शिकायतों की जांच संभागीय आयुक्त की कमेटी कर रही है, और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई निर्धारित की जाएगी। मिश्रा, जो पिछले दो महीनों से लगातार छुट्टी पर थीं, विवादों में उस समय आईं जब उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान औरंगजेब को कुशल प्रशासक बताया था। यह बयान तेजी से विवाद का विषय बना और विश्वविद्यालय में प्रदर्शन, विरोध और तनाव का वातावरण खड़ा हो गया।
विरोध इतना बढ़ा कि छात्रों ने एक दिन उनके चैंबर को अंदर से बंद कर दिया और वे कई देर फंसी रहीं। इसी बीच छात्र संगठनों ने लगातार चार दिनों तक विरोध प्रदर्शन किए, कांच फोड़े, नारे लगाए और प्रशासनिक भवन तक आंदोलन पहुंचाया। मिश्रा ने इस पूरे विवाद के दौरान कहा था कि उनका बयान संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया है और उनके खिलाफ साज़िश रची जा रही है, लेकिन माहौल उनके पक्ष में नहीं लौटा। उन्होंने 14 नवंबर को व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा भेजा था, जिसे अब स्वीकार कर उन्हें पदमुक्त कर दिया गया।
यह पहली बार नहीं है जब विश्वविद्यालय के शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी विवाद में आए हों। इससे पहले कुलपति अमेरिका सिंह के खिलाफ भी बीजेपी ने आंदोलन किया था और बाद में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए, हालांकि वे आरोपों से मुक्त हो गए। यह बताता है कि विश्वविद्यालय का ऊपरी प्रशासन अक्सर राजनीतिक दबाव और वैचारिक संघर्षों के केंद्र में आ जाता है, जहां घटनाओं की सतह पर जो दिखाई देता है वह शायद पूरा सच नहीं होता।
सुनीता मिश्रा की नियुक्ति अगस्त 2023 में हुई थी, और इस्तीफा स्वीकार होने तक का लगभग डेढ़ साल का कार्यकाल लगातार अस्थिरता और आरोपों की छाया में बीता। उदयपुर में हुई 12 सितंबर की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में दिए गए कथित विवादित बयान के बाद ही यह पूरा घटनाक्रम उफान पर पहुंचा था, जिसने न केवल विश्वविद्यालय को बल्कि राज्य की राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं को भी प्रभावित किया।
अब जब उनका इस्तीफा स्वीकार हो चुका है, विश्वविद्यालय एक नए प्रशासनिक दौर में प्रवेश करेगा, लेकिन यह घटना यह सवाल जरूर छोड़ जाती है कि क्या विश्वविद्यालयों में अकादमिक अभिव्यक्ति, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और छात्र आंदोलनों के बीच कोई संतुलन बचा है या ये संस्थान धीरे-धीरे ऐसे कूचे बन रहे हैं जहां हर निर्णय से पहले अनदेखे दबाव और अदृश्य शक्तियों को ध्यान में रखना पड़ता है।
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