
ब्रिस्बेन/पंजाब। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला पति और भारत के एक गांव में ससुराल—10 हजार किलोमीटर से ज्यादा की दूरी के बावजूद किरण (बदला हुआ नाम) पर हर पल नज़र रखी जाती थी। ब्रिस्बेन स्थित पति ने घर में लगे CCTV कैमरों के ज़रिये उसकी दिनचर्या पर निगरानी रखी। किरण बताती हैं, “वह कहता था—मैं तुम्हें हर समय देख सकता हूं।”
साल 2015 में पंजाब में सिख रीति-रिवाज से शादी के बाद किरण को विदेश में नए जीवन का सपना दिखाया गया था। लेकिन अगले आठ वर्षों में पति महज़ चार बार भारत आया—वह भी लगभग एक महीने के लिए। 2017 में पहले बच्चे के जन्म के बाद ससुराल में रसोई, बैठक और बाहर के हिस्सों में कैमरे लगाए गए।
घरेलू हिंसा और दक्षिण एशियाई महिलाओं की मदद करने वाली क्वींसलैंड स्थित ‘बैंगल फाउंडेशन’ की प्रमुख यास्मिन खान के मुताबिक, किरण जैसी हजारों भारतीय महिलाएं ‘अकेली दुल्हन’ बन रही हैं। शादी के बाद विदेश बसने का सपना दिखाकर उन्हें या तो छोड़ दिया जाता है, या दहेज के लिए इस्तेमाल किया जाता है—हालांकि भारत में 1961 से दहेज गैरकानूनी है। कई मामलों में महिलाओं से ससुराल में घरेलू काम करवाया जाता है, जिसे कार्यकर्ता आधुनिक गुलामी जैसा बताते हैं।
किरण कहती हैं कि पति ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया ले जाने का वादा किया था, लेकिन गर्भवती होने पर साफ कह दिया कि वह उन्हें कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं आने देगा। फोन कॉल पर वह सास के निर्देशों का पालन करने का दबाव बनाता और कैमरे के जरिए खाना बनाने तक पर टिप्पणी करता।
2022 तक किरण का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। समुदाय के बुज़ुर्गों के दबाव के बाद पति भारत आया और 2023 में उन्हें बच्चों के साथ ऑस्ट्रेलिया ले गया। लेकिन ब्रिस्बेन पहुंचकर पता चला कि पति ने उन्हें पार्टनर वीज़ा की जगह टूरिस्ट वीज़ा पर बुलाया था—जिससे स्थायी निवास का कोई रास्ता नहीं बनता। बाद में पति ने तलाक की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। जबकि बच्चे ऑस्ट्रेलियाई नागरिक हैं, किरण का वीज़ा भविष्य अनिश्चित है।
यास्मिन खान बताती हैं कि अस्थायी वीज़ा की असुरक्षा का फायदा उठाकर निगरानी और नियंत्रण—यानी ‘कोएर्सिव कंट्रोल’—किया जाता है। बैंगल फाउंडेशन को हर साल घरेलू हिंसा, वीज़ा दुरुपयोग और तस्करी से जुड़े करीब 1,000 कॉल मिलते हैं, जिनमें 60% महिलाएं अंतरराज्यीय या विदेश से संपर्क करती हैं। सांस्कृतिक मानदंड, शर्म और इज़्ज़त का डर कई प्रवासी महिलाओं को मुख्यधारा की सेवाओं तक पहुंचने से रोकता है।
किरण आज भी वीज़ा संकट से जूझ रही हैं और अपने दो बच्चों के साथ ऑस्ट्रेलिया में रहने की लड़ाई लड़ रही हैं। उनका कहना है, “मुझे उम्मीद है कि मेरे बच्चे ही मुझे वह खुशी देंगे, जो मैं अपने पति से चाहती थी।”
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