
राजनीति, जिसे जनता की सेवा और सहयोग का माध्यम माना जाता है, वह कब और कैसे संवेदनाओं को पीछे छोड़ केवल प्रदर्शन का खेल बन गई, यह समझ पाना मुश्किल होता जा रहा है। उदयपुर की इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो हमारी राजनीति की गहराई पर विचार करने को मजबूर करते हैं।
बीजेपी सांसद सीपी जोशी, जो हाल ही में प्रदेशाध्यक्ष भी रह चुके हैं, अपने ही पार्टी नेता प्रमोद सामर के पिता के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करने उदयपुर पहुंचे थे। यह एक मानवीय कर्तव्य और जिम्मेदारी का हिस्सा था। लेकिन इस दुख भरी घड़ी को भी सियासी रंग देने का जो प्रयास हुआ, वह न केवल अनुचित था, बल्कि संवेदनाओं की अनदेखी का एक उदाहरण भी बन गया।
सवाल यह है कि यह कैसा “परिवार”?
सांसद सीपी जोशी के साथ पार्टी के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ और उनके समर्थकों ने “स्वागत समारोह” रखा। यहां तक कि पटाखे भी छोड़े गए। जब मीडिया ने सवाल किया कि क्या किसी के दुख में शरीक होने जाते समय इस तरह का प्रदर्शन उचित है, तो सांसद महोदय का जवाब था कि “पार्टी के लोग परिवार के सदस्य हैं और उनसे मिलना गलत नहीं है।”
यह कहना सही हो सकता है कि पार्टी के लोग एक परिवार की तरह होते हैं। लेकिन दुख की घड़ी में “परिवार” का मतलब होता है संवेदनशीलता और सहानुभूति। यहां यह “परिवार” अपनी जिम्मेदारी से दूर होता दिखा, जब शोक सभा में भी दिखावे और प्रदर्शन को प्राथमिकता दी गई।
आतिशबाजी का सवाल और चुप्पी
जब आतिशबाजी पर सवाल किया गया, तो सीपी जोशी के पास कोई जवाब नहीं था। यह चुप्पी इस बात का प्रतीक है कि सियासी कार्यक्रमों में मानवीय मूल्यों की जगह खोती जा रही है। ऐसे समय में, जब समाज नेताओं से सही दिशा दिखाने की उम्मीद करता है, उनके इस प्रकार के व्यवहार जनता के विश्वास को आहत करते हैं।
नेताओं की जवाबदेही कहां है?
सांसद सीपी जोशी, जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ और उनके समर्थकों का यह रवैया राजनीति के उस गिरते स्तर को दिखाता है, जिसमें संवेदनाओं की कीमत पर प्रचार को प्राथमिकता दी जाती है। सवाल यह है कि क्या ऐसे व्यवहार से राजनीति के प्रति जनता का भरोसा मजबूत हो पाएगा?
क्या खो रहा है राजनीति का मूल उद्देश्य?
इस घटना की आलोचना करते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की सेवा करना है। संवेदनशीलता, सहानुभूति और गरिमा एक नेता की पहचान होनी चाहिए। लेकिन जब ये चीजें केवल दिखावे और ताकत के प्रदर्शन में खो जाएं, तो राजनीति केवल सत्ता की भूख बनकर रह जाती है।
क्या इससे कुछ सीखा जाएगा?
इस घटना ने यह तो साबित कर दिया कि सियासत में संवेदनशीलता की कितनी कमी हो गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नेताओं के लिए यह आत्ममंथन का विषय बनेगा? क्या सीपी जोशी और गजपाल सिंह राठौड़ जैसे नेताओं को यह एहसास होगा कि दुख के समय में प्रचार की नहीं, बल्कि सहानुभूति की जरूरत होती है?
आखिर में, राजनीति को केवल प्रदर्शन का माध्यम बनाने से रोकने के लिए जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यह घटनाएं हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि जब तक हम सही और संवेदनशील नेतृत्व को नहीं चुनेंगे, सियासत संवेदनाओं से यूं ही दूर होती रहेगी।
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