
देहरादून | देहरादून के प्रेमनगर इलाके में दो साल पहले एक सड़क हादसे में अपने इकलौते बेटे क्षितिज चौधरी को खोने वाली मां ललिता चौधरी की संघर्ष गाथा ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस द्वारा मामले में ‘फाइनल रिपोर्ट’ लगाकर केस बंद किए जाने के बाद, ललिता ने हार मानने के बजाय खुद ही सुबूत जुटाने का बीड़ा उठाया और तीन महीने तक सड़कों पर खाक छानी।
16 फरवरी 2024 की रात 18 वर्षीय क्षितिज को एक तेज रफ्तार डंपर ने टक्कर मार दी थी। मां का आरोप है कि हादसे के बाद न तो समय पर एम्बुलेंस मिली और न ही पुलिस ने तत्परता दिखाई। जब उन्होंने पुलिस से जांच की प्रगति पूछी, तो उन्हें दो-टूक जवाब मिला— “जादू की छड़ी नहीं है, सुबूत है तो खुद लेकर आओ।”
तीन महीने तक सड़कों पर की सुबूतों की तलाश
पुलिस की बेरुखी देख ललिता ने खुद जांच शुरू की। वे तीन महीने तक रोज़ाना उस सड़क पर घूमती रहीं, दुकानों और होटलों के सीसीटीवी खंगाले और आरटीओ कार्यालय के चक्कर काटे। उन्होंने शक के आधार पर 10 गाड़ियों के नंबर भी पुलिस को दिए, लेकिन प्रशासन ने उनकी मेहनत को नजरअंदाज कर केस की फाइल बंद कर दी।
किसान यूनियन का मिला साथ, दोबारा शुरू हुई जांच
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान ललिता ने किसान नेता राकेश टिकैत और सोमदत्त शर्मा से मुलाकात कर अपना दर्द साझा किया। किसान यूनियन के हस्तक्षेप और एसएसपी देहरादून प्रमेन्द्र डोभाल से मुलाकात के बाद अब पुलिस ने नए साक्ष्यों के आधार पर दोबारा जांच का आश्वासन दिया है। यूनियन ने चेतावनी दी है कि यदि अब भी न्याय नहीं मिला, तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
मां का भावुक संदेश
मूल रूप से मुजफ्फरनगर की रहने वाली ललिता चौधरी आज भी अपने बेटे के आखिरी शब्दों को याद कर सिहर जाती हैं। उन्होंने कहा— “जो काम पुलिस को करना चाहिए था, वह मैंने किया। मेरा बेटा मुझसे कह रहा था- मम्मी मुझे बचा लो।”
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