दिल्ली की दहलीज : मक्खी मारने के लिए हथौड़ा और लोकतंत्र का तमाशा

आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

दिल्ली के दिल में आज जो कुछ घटा, वह हमारे लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है। हुकूमतों का डरना और उस डर में आपा खोकर पूरे निज़ाम को ठप कर देना, यह किसी परिपक्व गणराज्य की निशानी नहीं हो सकती। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (एसआईआर) के विवाद को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और समूचे विपक्ष ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर दस्तक देने का क्या ऐलान किया, केंद्र सरकार के हाथ-पांव फूल गए।

एक तरफ नई दिल्ली और हज़रत निज़ामुद्दीन आने वाली दर्जनों प्रमुख मेल, एक्सप्रेस और लोकल ट्रेनों को रद्द कर दिया गया, वहीं दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर ताले जड़ने की घोषणा हो गई। सीआरपीएफ़ की 70 कंपनियों और क़रीब सात हज़ार संगीनों के साए में देश की राजधानी को एक तरह के अघोषित लॉकडाउन में तब्दील कर दिया गया। त्योहारों की चौखट पर, जब मुसाफ़िरों को घर लौटना था, तब इस तरह की प्रशासनिक बदहवासी किस मर्ज की दवा है?

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी ने आज सरकार के इस अति-उत्साह पर आईना रख दिया। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए दो-टूक कहा कि ‘मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।’ लोकतंत्र आनुपातिकता के सिद्धांत से चलता है। क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना हुकूमत का फ़र्ज़ है, लेकिन उसकी आड़ में आम शहरी, छात्र, दफ़्तर जाने वाले मुलाजिम और बुज़ुर्गों के आने-जाने के बुनियादी अधिकार को कुचल देना कहां का इंसाफ़ है? अदालत ने साफ़ लफ़्ज़ों में ताकीद की कि रेल और मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित तरीक़े से चलाया जाए।

उधर, सियासी अखाड़े में भी पारा पूरे उरूज पर रहा। संसद के सेंट्रल हॉल से विपक्षी सांसदों का हुजूम राष्ट्रपति भवन की ओर कूच कर गया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाक़ात कर ज्ञापन सौंपा। राहुल गांधी ने बाहर आकर बेहद तल्ख़ लहजे में दावा किया कि वोट चोरी और लोकतंत्र को कमज़ोर करने की साज़िश को लेकर राष्ट्रपति ने उनकी बात को नकारा नहीं, बल्कि सबूत मांगे हैं। विपक्ष अब इस पूरे मसले को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी में है।

वहीं, सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को लामबंद करने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी से लेकर सीजेपी के अभिजीत दीपके और आशुतोष रांका तक, सबने दिल्ली की घेराबंदी को सरकार की घबराहट करार दिया। उनका कहना है कि अगर आंदोलन में दम नहीं था, तो फिर पचासियों मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें रोकने की नौबत क्यों आई? सीजेपी ने ‘हाथ में संविधान और दिल में गांधी’ का नारा देकर शांतिपूर्ण मार्च का दावा किया है, जबकि पुलिस ने महज़ कम वक्त में सूचना देने और पुराने उल्लंघनों का हवाला देकर इजाज़त देने से इनकार कर दिया।

सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए अगर पहिए रोक दिए जाएं, तो यह हुकूमत की ताक़त नहीं बल्कि उसकी बेबसी को उजागर करता है। सरकार को समझना चाहिए कि संवाद का रास्ता बंद करके और सार्वजनिक जीवन को पंगु बनाकर कभी किसी मसले का हल नहीं निकला। सवाल चुनाव आयोग की साख का हो या जनता के भरोसे का, उसका जवाब खुले मैदान में पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, पहरेदारी और पाबंदियों से नहीं।

 

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