
वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को दिए साक्षात्कार में दावा किया है कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध “खत्म होने के करीब” है। ट्रंप ने आने वाले दिनों में पाकिस्तान में ईरान के साथ दूसरे दौर की आमने-सामने की बातचीत के संकेत दिए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य में सख्त नाकेबंदी
एक तरफ शांति वार्ता की चर्चा है, तो दूसरी तरफ सैन्य दबाव चरम पर है। अमेरिकी सेना ने ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में अपनी समुद्री नाकेबंदी दूसरे दिन भी जारी रखी। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान के समुद्री व्यापार को पूरी तरह से रोक दिया गया है। ओमान की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोत उन जहाजों को रोककर वापस भेज रहे हैं जो ईरानी बंदरगाहों से निकल रहे हैं।
प्रमुख घटनाक्रम और वैश्विक प्रतिक्रियाएं:
चीन और रूस का रुख: ईरान के सबसे बड़े तेल खरीदार चीन को इस नाकेबंदी से बड़ा झटका लगा है। इस बीच, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद कहा कि रूस, चीन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और ईरान से होने वाली तेल की कमी की भरपाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
पोप और ट्रंप के बीच जुबानी जंग: राष्ट्रपति ट्रंप और पोप लियो के बीच विवाद गहरा गया है। ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि ईरान का परमाणु हथियार हासिल करना किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने पोप की आलोचना करते हुए उन्हें विदेश नीति पर “कमजोर” बताया, जबकि पोप ने युद्ध की विभीषिका की निंदा जारी रखने की बात कही है।
यूरेनियम संवर्धन पर पेंच: दक्षिण कोरिया में IAEA प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने कहा कि ईरान पर यूरेनियम संवर्धन पर कितने समय का प्रतिबंध लगाया जाए, यह एक राजनीतिक निर्णय है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका 20 साल के प्रतिबंध पर अड़ा है, जबकि ईरान 5 साल का प्रस्ताव दे रहा है।
लेबनान और इजराइल: इजराइल ने लेबनान सरकार से हिजबुल्लाह को निहत्था करने की मांग की है। इजराइली अधिकारियों का कहना है कि वे केवल बमबारी से हिजबुल्लाह को खत्म नहीं कर सकते, इसके लिए लेबनान की सेना को जिम्मेदारी लेनी होगी।
क्षेत्रीय स्थिति : ईरान के विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी दबाव के बावजूद तेहरान अपनी नीतियों में बदलाव के कोई संकेत नहीं दे रहा है। वहीं, इस नाकेबंदी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ा राजनयिक और आर्थिक जोखिम साबित हो सकता है।
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