
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के पास हुए हमले के बाद यह बयान दिया कि वह थर्ड वर्ल्ड देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर स्थायी प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनके मुताबिक “थर्ड वर्ल्ड” में कौन-कौन से देश शामिल हैं। इसी वजह से यह सवाल एक बार फिर सुर्खियों में है कि आखिर थर्ड वर्ल्ड की अवधारणा क्या है और क्या भारत भी इसमें आता है?
थर्ड वर्ल्ड की अवधारणा क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार “थर्ड वर्ल्ड” एक पुराना और आज के दौर में लगभग अप्रचलित शब्द है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई, जब दुनिया शीत युद्ध के दो खेमों—अमेरिका के नेतृत्व वाले पूंजीवादी देश और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट देशों—में बंटी हुई थी।
जो राष्ट्र किसी भी गुट में शामिल नहीं हुए, उन्हें तीसरी दुनिया यानी थर्ड वर्ल्ड कहा गया। बाद में इस शब्द का इस्तेमाल उन देशों के लिए होने लगा जो आर्थिक रूप से कमजोर या विकास के प्रारंभिक चरण में माने जाते थे।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र और अर्थशास्त्री इस शब्द को अब अपमानजनक और पुराना मानते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी इसे अवांछित शब्द बताते हुए इसके इस्तेमाल को हतोत्साहित कर चुके हैं।
आज किन देशों को माना जाता है ‘सबसे कम विकसित’?
वर्तमान समय में “थर्ड वर्ल्ड” जैसा कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है। इसके बजाय संयुक्त राष्ट्र सबसे कम विकसित देशों (LDCs) की सूची जारी करता है। इसमें 44 देश शामिल हैं, जिनमें से 32 अफ्रीका में हैं।
एशिया के 8 देश—जैसे अफगानिस्तान, नेपाल, यमन, बांग्लादेश आदि—इस सूची में शामिल हैं।
इन देशों में प्रति व्यक्ति आय कम, स्वास्थ्य-शिक्षा ढांचा कमजोर और अर्थव्यवस्था अस्थिर मानी जाती है।
क्या भारत थर्ड वर्ल्ड देश है?
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत वर्तमान में किसी भी “थर्ड वर्ल्ड” श्रेणी में शामिल नहीं है, क्योंकि यह शब्द ही अब अप्रचलित है।
भारत न तो निम्न-आय वाले देशों में आता है
न ही यह संयुक्त राष्ट्र की LDC यानी सबसे कम विकसित देशों की सूची में शामिल है
भारत को आज विकासशील और उभरती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था (Emerging Economy) माना जाता है। यह दुनिया की तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।
हाँ, ऐतिहासिक संदर्भ में भारत गुट-निरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा था, इसलिए शीत युद्ध के दौर में इसे “थर्ड वर्ल्ड” देशों की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन आज के संदर्भ में भारत इस समूह का हिस्सा नहीं माना जाता।
निष्कर्ष
“थर्ड वर्ल्ड” एक राजनीतिक और ऐतिहासिक शब्द था, लेकिन आज यह न तो उपयोगी माना जाता है और न ही सम्मानजनक। मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे में भारत को विकासशील, उभरती अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ का हिस्सा माना जाता है—न कि “तीसरी दुनिया” का।
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