
इस्लामाबाद। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद आज एक ऐतिहासिक कूटनीतिक घटनाक्रम का केंद्र बनी है। दो हफ़्तों के अस्थायी युद्धविराम के बाद, अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति की संभावनाओं को तलाशने के लिए उच्च स्तरीय वार्ता शुरू हो गई है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस वार्ता को एक “कठिन लेकिन आवश्यक कदम” बताया है।
इस वार्ता की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दोनों देशों ने अपने सबसे प्रभावशाली और रणनीतिक दिग्गजों को मेज पर उतारा है।
ट्रंप की ‘पावर टीम’ : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मिशन के लिए अपनी सबसे विश्वसनीय टीम भेजी है, जिसका नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं।
जेडी वेंस (उपराष्ट्रपति) : वेंस इस वार्ता में ‘गुड कॉप’ की भूमिका में देखे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अन्य अमेरिकी नेताओं की तुलना में वेंस ईरान के लिए अधिक स्वीकार्य वार्ताकार के रूप में उभरे हैं।
स्टीव विटकॉफ : ट्रंप के मध्य पूर्व दूत और भरोसेमंद सहयोगी। विटकॉफ को एक स्पष्टवादी वार्ताकार माना जाता है जो जटिल गुत्थियों को सुलझाने में माहिर हैं।
जैरेड कुशनर : राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद, जिन्होंने ‘अब्राहम समझौते’ के जरिए मध्य पूर्व की राजनीति में अपनी धाक जमाई थी। उनकी मौजूदगी बताती है कि अमेरिका इस डील को लेकर कितना गंभीर है।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल : सैन्य और कूटनीतिक अनुभव का मेल
ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल में उन चेहरों को शामिल किया है जिनके पास न केवल कूटनीतिक अनुभव है, बल्कि जिन्हें रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) का पूरा समर्थन प्राप्त है।
मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ (संसद अध्यक्ष) : ईरानी दल का नेतृत्व कर रहे ग़ालिबाफ़ पूर्व सैन्य कमांडर रह चुके हैं। वे सेना और सत्ता के बीच समन्वय की सबसे मजबूत कड़ी हैं।
अब्बास अराग़ची (विदेश मंत्री) : अराग़ची को परमाणु वार्ताओं का लंबा अनुभव है। उन्हें एक मृदुभाषी लेकिन बेहद कुशल और चतुर राजनयिक माना जाता है।
पाकिस्तान की भूमिका : मध्यस्थ के रूप में बड़ी परीक्षा
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान इस वार्ता को सफल बनाने के लिए पूरी ईमानदारी से मध्यस्थता करेगा। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करने के लिए खुद पाकिस्तान के उप विदेश मंत्री इसहाक़ डार और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर हवाई अड्डे पर मौजूद थे।
हालांकि दोनों पक्ष मेज पर हैं, लेकिन विश्वास की कमी सबसे बड़ी बाधा है। पिछले एक साल में दो बार वार्ता के प्रयास विफल हो चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि जेडी वेंस और ग़ालिबाफ़ किसी ठोस नतीजे पर पहुँचते हैं, तो यह न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित होगा।
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