
बलिदान की प्रतिमूर्ति : पूर्व शासनकाल में सर्जन बेटे को गंवाने के बाद भी नहीं डिगा हौसला; इमाम हुसैन की भक्ति में समर्पित किया जीवन।
खौफ से फख्र तक का सफर : कभी गिरफ्तारी के डर से छिपकर करती थीं सेवा, आज पूरे मान-सम्मान के साथ तीर्थयात्रियों की बुझा रहीं प्यास।
कर्बला (इराक)। दक्षिण इराक के पवित्र शहर कर्बला में पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके भाई अल-अब्बास के मुकद्दस हरम (दरगाह) के बीच एक बुजुर्ग महिला को हर कोई पहचानता है। चिलचिलाती धूप और झुलसाने वाली गर्मी के बीच, एक हाथ में पानी की बड़ी बोतल और दूसरे हाथ में धातु का इकलौता गिलास थामे यह महिला श्रद्धालुओं की प्यास बुझाती नजर आती है। तीर्थयात्री इन्हें बड़े आदर से ‘हाज्जा उम्म जासिम’ कहकर पुकारते हैं। उम्र के अस्सी वसंत पार कर चुकीं उम्म जासिम के लिए इमाम हुसैन के जायरीन (तीर्थयात्रियों) की सेवा करना महज एक काम नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे बड़ा संबल और रूहानी सुकून है।
सद्दाम हुसैन के दौर में अबाया के नीचे छिपाकर लाती थीं पानी
आज भले ही उम्म जासिम आज़ादी और फख्र के साथ कर्बला आने वाले श्रद्धालुओं और वहां लगे ‘मावाकिब’ (सेवा शिविरों) में पानी बांटती हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब यह काम मौत को दावत देने जैसा था।
सद्दाम हुसैन के शासनकाल (2003 से पहले) के दिनों को याद करते हुए उम्म जासिम ने ‘शफाक न्यूज’ को बताया, “उन दिनों इमाम हुसैन का खुला मातम और धार्मिक रस्मों पर पाबंदी थी। सरकार इस पर कड़ी नजर रखती थी। मैं अपनी काली अबाया (लंबा बुर्का) के नीचे पानी की बोतलें छिपाकर लाती थी और चुपके से तीर्थयात्रियों को देती थी। उस दौर में सिर्फ किसी को पानी पिलाने भर से आपसे पूछताछ हो सकती थी, प्रताड़ित किया जा सकता था और जेल में भी डाला जा सकता था।”
तानाशाह ने छीन लिया डॉक्टर बेटा, पर नहीं टूटा हौसला
उम्म जासिम की इस अटूट आस्था की कीमत बेहद दर्दनाक रही है, जिसे देखकर कोई भी आम इंसान टूट जाता। सात बच्चों की मां उम्म जासिम के सबसे बड़े बेटे, जो पेशे से एक सर्जन (डॉक्टर) थे, उन्हें सद्दाम शासनकाल के दौरान सरेआम फांसी दे दी गई थी। इस गहरे सदमे और नुकसान के बावजूद उन्होंने इमाम हुसैन के रास्ते को नहीं छोड़ा।
वह भावुक होकर कहती हैं, “इमाम हुसैन मेरे शफीक (सिफारिशी) हैं, और आज मुझे खुदा के अलावा किसी का डर नहीं है। मेरी जिंदगी के जो भी दिन बचे हैं, मैं उन्हें इमाम हुसैन और उनके जायरीन की खिदमत में ही गुजारना चाहती हूं। यह सेवा मुझे वह सुकून देती है जो दुनिया में मुझे और कहीं नहीं मिल सकता।”
दुआओं का तोहफा और चेहरे पर सदाबहार मुस्कान
कर्बला आने वाले श्रद्धालुओं और सेवादारों का कहना है कि दोनों पवित्र दरगाहों के बीच उम्म जासिम अब एक जाना-पहचाना और सम्मानित चेहरा बन चुकी हैं। हर साल मुहर्रम और आशूरा के मौके पर वे उसी पुराने अंदाज में एक बोतल, एक धातु का गिलास और अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ हाजिर हो जाती हैं।
उम्म जासिम कहती हैं कि वे सिर्फ पानी नहीं पिलातीं, बल्कि उनके पास से कोई भी जायरीन बिना दुआओं के नहीं जाता। वे कहती हैं, “मैं हर एक गिलास पानी देने के साथ उस मुसाफिर की सेहत, खुशहाली और उसकी जायज मन्नतें पूरी होने की दुआ मांगती हूं।”
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