
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर शहर का नौगाम इलाका शुक्रवार की देर रात एक ऐसे धमाके से दहल उठा, जिसने शहर की रफ्तार, लोगों की नींद और गलियों की शांत लय—सब कुछ एक झटके में बदल दिया। रात लगभग 11 बजकर 20 मिनट पर नौगाम पुलिस थाने के भीतर हुआ ये धमाका सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं था, बल्कि पूरे इलाके की धड़कन को असामान्य रूप से तेज़ करने वाली घटना बन गया।
धमाके के तुरंत बाद नौगाम की तंग गलियों में अफरातफरी फैल गई। घरों के दरवाजे खुलने लगे, खिड़कियों पर सहमे हुए चेहरे दिखाई देने लगे और लोग अंदाज़ा लगाने लगे कि आखिर हुआ क्या है। किसी को लगा भूकंप है, किसी को हवाई हमला। लेकिन कुछ ही देर में रोते-बिलखते निकलते लोगों ने साफ़ कर दिया कि थाने के अंदर कुछ बड़ा हादसा हुआ है।
स्थानीय निवासी तारिक़ अहमद बताते हैं, “पहले लगा आसमान फट गया। 15-20 मिनट तक समझ ही नहीं आया क्या हो गया। जब लोग चीखते हुए बाहर निकले, तब पता चला कि थाने में ब्लास्ट हुआ है। वहाँ का हाल तो कयामत जैसा था—धुआं, चीखें, लाशें और चारों तरफ़ तबाही।”
जिस पुलिस थाने ने रोज़ाना शहर की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की ज़िम्मेदारी निभाई, वही थाने की इमारत खुद इस धमाके में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। आसपास के घरों का भी हाल बेहाल था—कहीं दीवारों में दरारें, कहीं टूटी खिड़कियां, तो कहीं उखड़े दरवाजे। एक स्थानीय ने बताया, “हमारा घर तो बच गया, लेकिन आस-पड़ोस वाले सब घरों का हाल देखकर डर लगता है। इतनी ज़ोर का धमाका—पहले कभी नहीं सुना।”
घटना के बाद प्रशासन एक्शन में आया और पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गई। रात की ठंड में बाहर खड़े लोग अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और परिचितों की खबर लेने की कोशिश में छटपटाते रहे, लेकिन किसी को भी धमाके वाली जगह के पास जाने की इजाजत नहीं थी। शहर के दूसरे हिस्सों में भी फोन बज रहे थे—लोग रिश्तेदारों से हालचाल पूछ रहे थे, पर सच ये था कि हादसे के बारे में आधी-अधूरी और डरावनी सूचनाएं ही फैल रही थीं।
धमाका उस विस्फोटक सामग्री में हुआ जो पिछले दिनों फरीदाबाद से बरामद कर यहां लाई गई थी। पुलिस और फॉरेंसिक टीमें दो दिनों से उससे सैंपल ले रही थीं। लेकिन रात होते-होते सब कुछ उलट गया—इस दुर्घटना में SIA अधिकारी, तीन फॉरेंसिक एक्सपर्ट, दो राजस्व कर्मचारी, दो फ़ोटोग्राफ़र और एक स्थानीय टेलर की मौत हो गई। 32 लोग घायल होकर अस्पताल पहुंचाए गए।
डीजीपी नलिन प्रभात और गृह मंत्रालय दोनों ही इसे हादसा बता रहे हैं, लेकिन शहर में डर से ज़्यादा सवाल तैर रहे हैं—क्या इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक को खुले परिसर में रखना सुरक्षित था? क्या सैंपलिंग की प्रक्रिया पूरी तरह मानकों के तहत थी? और सबसे बड़ा सवाल—आख़िर ऐसा कैसे हो गया कि पुलिस स्टेशन के भीतर मौत का इतना बड़ा मंज़र बन गया?
नौगाम के लोग अब भी सदमे में हैं। दिन निकलते ही इलाके में एक अजीब-सी चुप्पी छा गई—मानो हर घर, हर दीवार इस घटना के निशान समेट रही हो। बाजार आधे बंद रहे, बच्चे स्कूल नहीं गए और गलियों में सिर्फ़ फुसफुसाहटें थीं—“क्या हुआ होगा?”, “किसकी गलती थी?”, “क्या ये सच में हादसा था?”
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