
नई दिल्ली/जयपुर। अरावली पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बेहद सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि कोर्ट की रोक के बावजूद अरावली क्षेत्र में अवैध खनन की गतिविधियां निरंतर जारी हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इसे तुरंत नहीं रोका गया, तो हालात इतने गंभीर हो जाएंगे कि उन्हें दोबारा सुधारना संभव नहीं होगा।

एक्सपर्ट कमेटी करेगी वैज्ञानिक समीक्षा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की विशेष बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) गठित करने का निर्णय लिया है। यह कमेटी अरावली की परिभाषा, इसके वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और भूवैज्ञानिक पहलुओं की विस्तृत समीक्षा करेगी। कोर्ट ने सभी पक्षों से विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है, ताकि चरणबद्ध तरीके से टीम का गठन किया जा सके।
राजस्थान सरकार ने दी गारंटी
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए के.एम. नटराजन ने अदालत को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार प्रदेश में किसी भी प्रकार के अवैध खनन को रोकने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाएगी। कोर्ट ने इस पर राज्य सरकार से स्पष्ट गारंटी ली कि अरावली क्षेत्र में अब कोई भी अवैध गतिविधि नहीं होने दी जाएगी।
सुनवाई की मुख्य बातें : परिभाषा पर मंथन: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि हिमालय और अरावली जैसी पर्वतमालाओं को केवल ऊंचाई से परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें निरंतर टेक्टोनिक मूवमेंट होते रहते हैं। इसकी परिभाषा के पीछे ठोस विज्ञान होना चाहिए।
पुराना आदेश प्रभावी : कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 29 दिसंबर 2025 को जारी अंतरिम आदेश फिलहाल प्रभावी रहेगा।
स्वैच्छिक संज्ञान : बेंच ने कहा कि यह कोई आपसी विवाद (Adversarial litigation) नहीं है, बल्कि इसका एकमात्र उद्देश्य अरावली पर्वतमाला का संरक्षण करना है।
क्यों पैदा हुआ विवाद?
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 20 नवंबर को 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों पर खनन की अनुमति दी थी। इस आदेश के बाद देशभर में पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। हालांकि, अपनी गलती को सुधारते हुए कोर्ट ने 29 नवंबर को इस आदेश पर रोक लगा दी थी और केंद्र सहित चार राज्यों (राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा) को नोटिस जारी किया था।
अगला कदम : कोर्ट अब 29 दिसंबर के आदेश के संदर्भ में एक व्यापक नोट और अहम सवालों पर विचार करेगा, ताकि अरावली के भविष्य पर कोई स्थायी और वैज्ञानिक निर्णय लिया जा सके।
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