“मनोज कुमार को उदयपुर की खास श्रद्धांजलि : ‘यादगार’ के उस गीत ने आज भी जिंदा रखी समाज की आत्मा”

फोटो सहयोग : कमल कुमावत


सैयद हबीब, उदयपुर।

सिनेमा जब सिर्फ मनोरंजन न होकर समाज का आईना बन जाए… तो कलाकार अमर हो जाते हैं। ऐसे ही थे मनोज कुमार। ‘भारत कुमार’ के नाम से मशहूर इस अभिनेता के निधन की खबर से पूरे देश में शोक है… लेकिन उदयपुर में यह शोक एक याद के रूप में सामने आया—एक ऐसी फिल्म की याद जो आज भी समाज को आईना दिखाती है।

साल था 1970… फिल्म थी ‘यादगार’। और मंच बना उदयपुर का सबसे प्रमुख चौराहा सूरजपोल, जहां फिल्माया गया वो गीत, जिसने उस दौर के समाज की सच्चाई को बिना लाग-लपेट के परदे पर उतार दिया।

गाने के बोल थे—
“एक तारा बोले तुन तुन तुन, क्या कहे ये तुमसे…”
यह सिर्फ एक धुन नहीं थी… यह एक दर्शन था।

इस गाने में मनोज कुमार ने समाज में बढ़ते फैशन से घटते कपड़ों पर तंज किया… एटम बम और हथियारों की होड़ पर सवाल उठाया…गरीबी, परिवार नियोजन, क्लब कल्चर, भ्रष्ट नेता और सत्ता की कुर्सी तक—हर उस मुद्दे को उठाया जो उस दौर की जनता को भीतर तक झकझोरता था।

गाने में उन्होंने कहा—”शास्त्री की सादा जीवन, नेहरू की ऊँची सोच अपनाओ…”
ये सिर्फ नेताओं के नाम नहीं थे… ये उस समय की नैतिकता और दूरदृष्टि की मिसालें थीं, जिन्हें अपनाने का संदेश मनोज कुमार अपने अंदाज़ में दे रहे थे।

“उस वक्त किशोरावस्था में रहे राजेंद्र हिलोरिया बताते हैं कि पूरा शहर जमा हो गया था शूटिंग देखने। मनोज जी खुद सीन के बाद लोगों से मिलते, बातें करते। वो गीत तो जैसे उदयपुर की रूह पर दर्ज हो गया था।”

इस गीत ने एक और बात कही थी—देश में अमन की बात। भाईचारे की बात। ऐसे समय में जब समाज टकराव के रास्तों पर चल रहा था, मनोज कुमार अपने सिनेमा के जरिए शांति और समरसता का संदेश दे रहे थे।

‘यादगार’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी… यह अपने वक्त की सामाजिक और राजनीतिक दस्तावेज़ भी थी।

इसमें दो किरदार थे—मोहनलाल और भानु।
मनोज कुमार खुद फिल्म में मोहनलाल के किरदार में थे, जबकि हास्य अभिनेता मोहन चोटी, भानु नाम के किरदार में।

अब दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में राजस्थान की राजनीति में दो बड़े नाम छाए हुए थे—मोहनलाल सुखाड़िया और भानुकुमार शास्त्री।

एक कांग्रेस के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री… दूसरा जनसंघ के तेजतर्रार नेता।

फिल्म में इन नामों का इस्तेमाल एक इत्तेफाक बताया गया, लेकिन जानकारों की मानें तो यह इत्तेफाक उस दौर की राजनीतिक छाया का एक संकेत भी था।

मनोज कुमार ने भले ही फिल्म में सीधे कुछ न कहा हो… लेकिन नामों के जरिए संकेत जरूर दे दिए।

मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं… लेकिन उदयपुर के उस चौराहे पर फिल्माया गया गीत आज भी जिंदा है। एक समाज की चेतना बनकर, एक पीढ़ी की सोच बनकर। भारत कुमार को उदयपुर की ज़मीन से भावभीनी श्रद्धांजलि।

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