
सैयद हबीब, उदयपुर।
अहमदाबाद की एक ठंडी सुबह… ज़ाइडस अस्पताल के एक कमरे में वक्त ठहर सा गया है। वहीं, एक बिस्तर पर लेटी हैं देश की वो बेटी, जिसने शब्दों को हथियार बनाया, संवेदना को शक्ति, और राजनीति को सेवा का पर्याय। हम बात कर रहे हैं डॉ. गिरिजा व्यास की—एक ऐसा नाम, जो नारी सशक्तिकरण की आवाज़ बना, संसद के गलियारों में जिनके शब्दों ने कई बार सन्नाटा तोड़ा।
आज वही गिरिजा दीदी अस्पताल में हैं, बीमारी से लड़ रही हैं, पर जज़्बा अब भी वही है—अडिग, अचल।
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की चिंता केवल एक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं, ये उस स्नेह का प्रतिबिंब है, जो उन्होंने दशकों की सेवा से कमाया है। सोनिया गांधी की आवाज़ में माँ जैसी चिंता थी, राहुल गांधी की बातों में बेटे जैसा अपनापन, और मल्लिकार्जुन खड़गे के शब्दों में एक सीनियर साथी की बेचैनी।
गोपाल कृष्ण शर्मा, जो कभी पार्टी में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे, आज उनके स्वास्थ्य की रिपोर्ट ले जाने वाले दूत बने। उन्होंने न सिर्फ दिल्ली के नेताओं को डॉ. व्यास की स्थिति बताई, बल्कि हर उस कार्यकर्ता की भी भावना पहुंचाई, जिनके लिए ‘गिरिजा दीदी’ सिर्फ एक नेता नहीं, एक मार्गदर्शक हैं।
अस्पताल में बेटे डॉ. विवेक शर्मा, बहू हितांशी और दामाद विपुल की आंखें भले ही नम हैं, लेकिन उनमें डर नहीं—क्योंकि उन्हें पता है, उनकी गिरिजा मां कभी हार नहीं मानती।
देश को जिन शब्दों ने हिम्मत दी, आज उन्हीं शब्दों से हम सब मिलकर एक दुआ मांगते हैं—
“ईश्वर गिरिजा दीदी को जल्द स्वस्थ करें,
क्योंकि अभी बहुत से लोगों को उनकी ज़रूरत है—
एक नेता की नहीं, एक जीती-जागती प्रेरणा की।”
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