“सुरों के साज़ पर जब छिड़ती है तान, रूह झूम उठती है, महक उठता है जहान।”
उदयपुर। जब हुस्न-ए-मौसीक़ी (संगीत की ख़ूबसूरती) और पाकीज़ा अदब का एक मुक़द्दस संगम होता है, तो ज़माने की फिज़ाओं में रूहानी रस घुल जाता है। ‘विश्व संगीत दिवस’ के इस बा-वक़ार (गरिमापूर्ण) मौक़े पर ‘शायराना उदयपुर परिवार’ ने सुरों की एक ऐसी हसीन बज़्म सजाई, जिसने समां बांध दिया। ऐश्वर्या कॉलेज के साये में मुनाकद (आयोजित) इस ‘मुक़ाबला-ए-मौसीक़ी’ ने न सिर्फ़ सामईन (श्रोताओं) के दिलों को मोम किया, बल्कि शास्त्रीय संगीत की रूहानी लहरों ने पूरे अवाम को सुरों के एक अनूठे जहान की सैर करा दी।
मसनद-ए-ख़ास: अदीबों और फ़नकारों से गुलज़ार हुई बज़्म
इस महफ़िल-ए-ख़ास की रौनक़ को दोबारा अता करने के लिए मुल्क के कई अज़ीम और दानिशवर (बुद्धिजीवी) चेहरों ने शिरकत फ़रमाई:
सद्र-ए-महफ़िल (मुख्य अतिथि): प्रताप गौरव केंद्र के मोहतरम डायरेक्टर डॉ. अनुराग सक्सेना ने अपनी ज़रीं मौजूदगी से मसनद-ए-आला को सुशोभित किया।
सरपरस्त (अध्यक्षता): मारूफ़ (प्रसिद्ध) मुअर्रिख़ (इतिहासकार) डॉ. हुकुम राज जोशी ने इस सुरीली शाम की सदारत फ़रमाई।
मुंसिफ़ीन-ए-कराम (जज): फ़न-ए-मौसीक़ी के शहसवार—प्रतापगढ़ के अज़ीम मौसीक़ार मुकेश वैष्णव, नागौर के उस्ताद जितेन्द्र वर्मा और सुरों के नब्ज़-शनास डॉ. राकेश माथुर बतौर विशिष्ट अतिथि तशरीफ़ लाए।
बज़्म की रवायत और तहज़ीब को मलहूज़-ए-ख़ातिर (ध्यान में) रखते हुए तमाम मुअज़्ज़ज़ (आदरणीय) मेहमानों का इस्तक़बाल ‘उपरना’ और अफ़्तिख़ार की अलामत ‘पाग’ (पगड़ी) पहनाकर बेहद सादगी और एहतराम के साथ किया गया।
सुरों का कारवां: चप्पे-चप्पे से खिंचे चले आए फ़न-के-राही
इस सुरीले मुक़ाबले की कशिश ऐसी थी कि राजस्थान के गोशे-गोशे से फ़नकार परवानों की तरह खिंचे चले आए। नागौर, प्रतापगढ़, राजसमंद, नाथद्वारा, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, भीलवाड़ा और कपासन की मखमली माटी से आए सुर-साधकों ने अपनी रूहानी गायकी से इस शाम को अमर बना दिया।
बज़्म के निगहबान और साहिब-ए-तर्ज़ गुलूकार (गायक) ललित गोयल ने महफ़िल का तआरुफ़ (परिचय) कराते हुए अवाम से अर्ज़ किया:
“शायराना परिवार पिछले पंद्रह बरसों से ब-ला मुआवज़ा (नि:शुल्क) अदब और मौसीक़ी की ख़िदमत-ए-ख़ल्क कर रहा है। यह महफ़िल हमारी नई नस्ल को अपनी रिवायतों, तहज़ीब और अदबी जड़ों से वाबस्ता करने का एक पाकीज़ा ज़रिया है, जिससे आज मुल्क के कोने-कोने से नायाब फ़नकार जुड़े हुए हैं।”
इस बज़्म में सिर्फ़ आम फ़िल्मी तराने ही नहीं गूंजे, बल्कि रूह को छू लेने वाली विधाओं की नुमाइश हुई:
शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय (सेमी-क्लासिकल) गायन की ऐसी तानें छेड़ी गईं कि दिल बाग़-बाग़ हो गया।
ग़ज़ल, दोहे, छंद और मुर्कियों की शक्ल में अलफ़ाज़ का गुलदस्ता पेश किया गया।
सूफ़ियाना कलाम, भजनों और रिवायती लोकगीतों के साथ साज़िंदों ने अपने वाद्य-यंत्रों से रूहानी समां बांध दिया।
मुंसिफ़ीन की ज़ौक़-ए-नज़र और सुरीली गुफ़्तगू
मोहतरम मुकेश वैष्णव ने जब तानपूरे के तारों को छेड़कर उप-शास्त्रीय गायन की तान अलापी, तो पूरी महफ़िल पर एक वज्द (दीवानगी) की कैफ़ियत छा गई। सामईन की पुरज़ोर गुज़ारिश पर उन्होंने कई दिलकश नग़मे नज़्र किए।
उस्ताद डॉ. राकेश माथुर ने तानपूरे की संगत में मुख़्तलिफ़ रागों पर आधारित ऐसी नायाब ‘मुर्कियां’ बिखेरीं कि बज़्म के हर कोने से ‘वाह-वाह’ और ‘सुभान-अल्लाह’ की सदाएं बुलन्द होने लगीं।
साहिब-ए-फ़न जितेन्द्र वर्मा (नागौर) ने शास्त्रीय संगीत की बंदिशों के साथ जब बांसुरी पर अपनी सासों को फूंका, तो ऐसा लगा जैसे चलती हवाएं भी ठहरकर सुर सुन रही हों।
तमाम मुंसिफ़ों (जजों) ने फ़नकारों के इस आला मेयार (उच्च स्तर) को सराहते हुए कहा कि ‘शायराना’ सिर्फ़ एक तंज़ीम नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब, रवायत और अख़लाक़ का अमीन (रखवाला) है।
फ़ैसला-ए-मुक़ाबला: सुरों की कहकशां के चमकते सितारे
फ़नकारों का हुनर इस क़दर शबाब पर था कि मुंसिफ़ीन के लिए फ़ैसला कुन (निर्णायक) मोड़ पर पहुंचना एक कड़ा इम्तिहान साबित हुआ। आख़िरकार, फ़न की बारीकियों के आधार पर ये नाम सुर्ख़ियों के ज़ीनत बने:
शब-ए-अव्वल (प्रथम स्थान): पंकज वीरवाल (उदयपुर)
मक़ाम-ए-दोम (द्वितीय स्थान): कुमार दिनेश (राजसमंद)
मक़ाम-ए-सोम (तृतीय स्थान – संयुक्त): हेमा जोशी और नीलम कौशिक
तमाम कामयाब और बा-हुनर फ़नकारों को ख़ूबसूरत ट्रॉफ़ी, मुक़द्दस उपरना, सनद (प्रमाण पत्र), नयाब तोहफ़े और शायराना उदयपुर परिवार की तउम्र (आजीवन) नि:शुल्क रुकनियत (सदस्यता) पेश कर उनका हौसला बढ़ाया गया।
शायरी की चाशनी और मुस्तक़बिल के हसीन वादे
इस पूरी महफ़िल को लफ़्ज़ों की नज़ाकत, मुकम्मल शेरो-शायरी, रुबाइयों और दोहों के मखमली धागे में पिरोने का नाज़ुक काम साहिबा आभा सिरसीकर ने किया। उनकी सलीक़ेदार और बा-अदब निज़ामत (संचालन) ने महफ़िल-ए-सुर को चार चांद लगा दिए।
संस्थापक मनोज गीतांकर ने अपने जज़्बात का इज़हार करते हुए फ़रमाया कि मौसीक़ी ही हमारी तहज़ीब का पाक आईना है, जो आज के दौर के भटकते हुए युवाओं को एक सकारात्मक और साफ़-सुथरी दिशा अता करती है। सामईन और अज़ीम मेहमानों की पुरख़ुलूस गुज़ारिश पर उन्होंने ऐलान किया कि जल्द ही आम अवाम के लिए एक ‘नि:शुल्क संगीत कार्यशाला’ (फ्री म्यूज़िक वर्कशॉप) और ‘म्यूज़िकल फेस्टिवल’ का इनक़ाद (आयोजन) किया जाएगा, ताकि प्रदेश की छिपी हुई प्रतिभाओं को एक परवाज़ मिल सके।
इनकी रूहानी मौजूदगी ने शाम को बनाया यादगार: इस सुरमई दास्तान को मुकम्मल करने में हेमंत सूर्यवंशी (अकाउंट ऑफिसर), लक्ष्मी आसवानी, जय किशन आसवानी, डॉ. विमल शर्मा, सोहन लाल, अजीत सिंह खींची, शामिल शेख, एकता नागदा, एस. डी. कौशल, भव्या अरोड़ा, दीक्षा नाथ राठौड़ और कमलेश कुमावत की पुरअसरार मौजूदगी और रूहानी गायकी का एक अज़ीम और न भूलने वाला योगदान रहा।
“महफ़िल ख़त्म हुई मगर सुरों की महक बाक़ी है, दिलों में धड़कती हुई मौसीक़ी की खनक बाक़ी है।”
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