
उदयपुर। आज झीलों की नगरी उदयपुर की फिज़ाओं में सिर्फ ठंडक नहीं, बल्कि उन मजलूमों की दुआओं का असर था जिनकी तकदीर को दुनिया ने ‘अधूरा’ करार दे दिया था। नारायण सेवा संस्थान के ‘सेवा महातीर्थ’ में सजा 45वां दिव्यांग-निर्धन सामूहिक निकाह व विवाह समारोह महज़ एक रस्म नहीं, बल्कि इंसानियत का वो ‘मोजिज़ा’ (चमत्कार) था जहाँ जिस्मानी मजबूरियाँ जज्बातों के आगे सजदा कर रही थीं।
शहनाइयों की गूंज और सिसकियों का सलाम
तसव्वुर कीजिए उस मंजर का… जब मंडप में शहनाइयां गूँजीं और वो 51 चेहरे सामने आए जिन्हें जमाने ने कभी ‘बोझ’ समझा था। किसी के हाथों में बैसाखी थी, किसी की आँखों में दुनिया का नूर न था, तो किसी के कदम डगमगा रहे थे। लेकिन जब उन कांपते हाथों ने एक-दूसरे का साथ थामकर सात फेरे लिए, तो वहां मौजूद हजारों लोगों का दिल भर आया। यह मंजर इस बात की गवाही दे रहा था कि रिश्ता जिस्मों का नहीं, रूहों का पाकीज़ा मेल होता है।

विजय और मंजू : जहां नुक्स नहीं, सिर्फ अक्स दिखा
इस महफ़िल की सबसे पुरअसर दास्तान गुजरात के विजय और उदयपुर की मंजू की रही। मंजू के पैरों में जुम्बिश (हरकत) न थी, पर विजय ने जब उनका हाथ थामकर उन्हें अपनी ‘शरीक-ए-हयात’ चुना, तो लगा मानो आसमां से फरिश्ते उतर आए हों। विजय के वो अलफ़ाज़— “मंजू भले ही चल न सके, पर वो मेरे घर की रौनक और मेरी उजड़ी दुनिया की धड़कन बनेगी”—ने पत्थर दिल इंसान को भी रुला दिया। यहाँ कमियों पर ‘इश्क और एतबार’ की मुकम्मल फतह हुई।
विदाई का वो मर्मस्पर्शी लम्हा : जब दीवारें भी रो पड़ीं
समारोह का सबसे गमगीन और रूहानी लम्हा वह था, जब उन बेटियों की डोली उठी। कल तक जो खुद को बेसहारा समझती थीं, आज वे ‘नारायण परिवार’ के लाड़ और दुआओं के साथ अपना घर बसाने जा रही थीं। जब संस्थान के बानी पद्मश्री कैलाश ‘मानव’ और सद्र प्रशांत अग्रवाल ने एक बाप की तरह उनके सिर पर हाथ रखा, तो समूचा पंडाल सिसकियों से गूंज उठा। संस्थान ने उन्हें सिर्फ पलंग, अलमारी और बर्तन नहीं दिए, बल्कि वो ‘खुद्दारी’ और ‘अकीदत’ दी जो उन्हें ताउम्र सर उठाकर जीना सिखाएगी।

खिदमत-ए-खल्क का लाज़वाब सफर
आज उन 51 जोड़ों की आँखों में अपने आशियाने का हसीन ख्वाब था। इनमें से ज्यादातर वो मुसाफिर थे जिन्होंने इसी संस्थान में अपनी टूटी हड्डियों का इलाज कराया, यहीं नए पैर पाए और यहीं हुनर सीखकर आत्मनिर्भर बने। प्रशांत अग्रवाल ने भरे गले से कहा, “यह हमारी जानिब से कोई अहसान नहीं, बल्कि इंसानियत का वो कर्ज है जो हम उतार रहे हैं।” अब तक 2510 घरों को आबाद कर चुका यह संस्थान आज फिर एक ऐसी इबादत कर गया, जिसे तारीख कभी भुला नहीं पाएगी।






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