
उदयपुर। चेतक की वीरभूमि, मेवाड़—जहां हर कण में शौर्य की गाथाएं गूंजती हैं—इन दिनों फिर से घोड़ों की टापों से थरथरा रही है। उदयपुर जिले के मावली कस्बे में जारी मेवाड़-मरवाड़ अश्व प्रदर्शनी परंपरा, जोश और गौरव का अनोखा संगम बन गई है। राजस्थान के कोने-कोने से आए अश्वप्रेमी और पालक अपने-अपने श्रेष्ठ घोड़ों के साथ यहां जुटे हैं, मानो चेतक का वंश आज भी अपनी वीरता का परिचय देने आया हो।

जिला कलेक्टर नमित मेहता गुरुवार शाम जब मावली पहुंचे, तो पूरा मैदान तालियों और अश्वों की टापों से गूंज उठा। उपखंड अधिकारी रमेशचंद्र सीरवी और आयोजन समिति के सदस्यों ने पारंपरिक अंदाज़ में उनका स्वागत किया। चारों ओर बजती ढोल-नगाड़ों की थाप और घोड़ों की सजावट ने मानो मेवाड़ की गौरवगाथा को जीवंत कर दिया।
प्रदर्शनी स्थल पर सजे रंगीन पंडालों और स्टॉलों में परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम नजर आया। कहीं राजस्थानी तुर्बन में सजे घोड़े अपने सौंदर्य का प्रदर्शन कर रहे थे, तो कहीं अश्वपालक अपनी नस्लों के गुणों का बखान करते दिखाई दिए। कलेक्टर मेहता ने हर स्टॉल पर जाकर अश्वपालकों से संवाद किया, उनकी मेहनत और जुनून की सराहना की।
उन्होंने कहा — “ऐसे आयोजन न सिर्फ़ हमारी परंपरा को जीवित रखते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को यह सिखाते हैं कि संस्कृति केवल इतिहास की बात नहीं, बल्कि आज भी हमारे जीवन की सांसों में बसी हुई है।”
प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण रहे मारवाड़ी, सिंधिया और काठी नस्ल के घोड़े, जिनकी चाल, शान और प्रशिक्षण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कुछ अश्व तो ऐसे थे जिनके कदमों की ताल पर दर्शक खुद को रोक न सके — हर टाप में मानो शौर्य की गूंज थी, हर अदा में चेतक की झलक।
ढलती शाम में जब सूरज की किरणें मैदान पर सुनहरी आभा बिखेर रहीं थीं, तब घोड़ों के प्रदर्शन ने मेवाड़ की धरती को एक बार फिर उस गौरव से भर दिया, जिसकी मिसाल इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
मावली का यह अश्व मेला केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि राजस्थान की आत्मा में बसती परंपरा और गौरव का उत्सव बन गया है — जहां हर टाप में विरासत बोलती है और हर नज़र में चेतक की झलक चमकती है।
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