
उदयपुर। कहते हैं जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन उन्हें धरती पर सहेजने का काम ‘सेवा महातीर्थ’ करने जा रहा है। उदयपुर का लियों का गुड़ा स्थित नारायण सेवा संस्थान का परिसर एक बार फिर उन आंखों के सपनों को हकीकत में बदलने के लिए तैयार है, जिन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता या आर्थिक तंगी के कारण कभी डोली और शहनाई की उम्मीद छोड़ दी थी। संस्थान के 45वें दिव्यांग एवं निर्धन निःशुल्क सामूहिक विवाह की तैयारियां अब अपने उस मुकाम पर हैं, जहां बस इंतजार है उन जोड़ों का, जो यहाँ से एक नया संसार बसाने निकलेंगे।
बैसाखियों के सहारे नहीं, एक-दूसरे के हाथ थामकर चलेंगे हमसफर
इस विवाह की सबसे मर्मस्पर्शी बात यह है कि यहाँ दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे की कमजोरी को नहीं, बल्कि एक-दूसरे की ताकत को अपनाएंगे। संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने भावुक होते हुए बताया कि यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उन रूहों का मिलन है जिन्होंने समाज की उपेक्षा और अपने शरीर की सीमाओं से लड़कर आज गृहस्थी बसाने का साहस जुटाया है। परिसर को किसी महल की तरह सजाया गया है ताकि इन जोड़ों को महसूस हो सके कि उनका जीवन भी किसी उत्सव से कम नहीं है।
शुक्रवार से शुरू होगा भावनाओं का संगम
कल शुक्रवार से जब देश के अलग-अलग राज्यों से वर-वधू और उनके परिजन सेवा महातीर्थ की चौखट पर कदम रखेंगे, तो माहौल खुशियों और आंसुओं (हर्ष के) के अनूठे मेल से भर जाएगा। कई माता-पिता ऐसे होंगे जिन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी दिव्यांग बेटी के सिर पर भी सेहरा सजेगा या उनके बेटे का घर भी आबाद होगा।
हल्दी की महक और फेरों का संकल्प
शनिवार की शाम: हल्दी और मेहंदी की रस्मों के बीच जब इन जोड़ों के हाथों में पिया के नाम की मेहंदी रचेगी, तो वह केवल रंग नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक होगी। संगीत की धुनों पर जब ये दिव्यांग जोड़े अपने तरीके से थिरकेंगे, तो वह दृश्य हर किसी के दिल को छू लेगा।
रविवार का सूर्योदय: यह वह पावन दिन होगा जब तोरण और वरमाला की रस्म के बाद, अग्नि को साक्षी मानकर ये जोड़े ‘सप्तपदी’ (सात फेरे) लेंगे। मंत्रोच्चार के बीच जब वे सात वचन दोहराएंगे, तो वह समाज के लिए एक संदेश होगा कि प्रेम शारीरिक बाधाओं से कहीं ऊपर है।
देशभर से जुटेंगे ममता के हाथ
इस पावन यज्ञ में आहुति देने के लिए देशभर से करीब 700 भामाशाह और अतिथि उदयपुर पहुँच रहे हैं। ये वे लोग हैं जो इन जोड़ों को आशीर्वाद देने के साथ-साथ उनके नए घर को बसाने के लिए अपनी ममता और सहयोग की पूंजी भी साथ ला रहे हैं।
रविवार की शाम जब यहाँ से डोलियां विदा होंगी, तो ‘सेवा महातीर्थ’ की माटी भी नम होगी, लेकिन इस संतोष के साथ कि आज कई जोड़ों ने अपनी दिव्यांगता को पीछे छोड़ते हुए खुशियों के सफर पर कदम बढ़ा दिए हैं।
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