
उदयपुर। इंसानी ज़िंदगी भी किसी हाईवे की तरह हो गई है—बेतरतीब, बेखौफ और बेहद असुरक्षित। उदयपुर-नाथद्वारा नेशनल हाईवे पर चीरवा टनल के मुहाने से ठीक पहले जो हुआ, वह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि रफ़्तार के उस जुनून का नतीजा है जो मासूमों को लील जाता है। शाम के साढ़े पांच बज रहे थे, सूरज ढलने की तैयारी में था, पर किसे पता था कि एक अनियंत्रित ट्रेलर तीन जिंदगियों का सूरज हमेशा के लिए अस्त कर देगा।
एक बाइक पर सवार तीन युवक—प्रेमचंद, मुकेश और नौ साल का नन्हा रियान। पहाड़ों की ओट से निकलती ठंडी हवाओं के बीच वे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे होंगे, शायद घर पर कोई उनका इंतज़ार कर रहा होगा। तभी पीछे से काल बनकर आए उस भारी-भरकम ट्रेलर ने उन्हें ऐसी टक्कर मारी कि मौत को संभलने का मौका तक नहीं मिला। टक्कर इतनी वीभत्स थी कि वे युवक उछलकर दूर जा गिरे और वहीं सड़क की निष्ठुरता के बीच उनकी सांसें थम गईं।
पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि हम सड़कों को चौड़ा तो कर रहे हैं, पर हमारी संवेदनाएं संकरी होती जा रही हैं। वह ट्रेलर, जो टक्कर मारने के बाद खुद भी पलट गया, उस अंधे जुनून का प्रतीक है जहां ड्राइवर के हाथ में स्टयरिंग तो होता है, पर दिमाग में नियंत्रण नहीं। सड़क पर बिखरे हुए ट्रेलर के कट्टे और मलबे के बीच दबी वह क्षतिग्रस्त बाइक चीख-चीख कर कह रही है कि छोटी गाड़ियों का जीवन बड़े वाहनों की ‘मर्जी’ पर निर्भर हो गया है।
पुलिस अब शिनाख्त और पोस्टमार्टम की कागजी औपचारिकताएं पूरी कर रही है। एमबी हॉस्पिटल की मोर्चरी में रखे वे तीन बेजान शरीर उस समाज से सवाल पूछ रहे हैं जहाँ रफ़्तार को ही तरक्की का पैमाना मान लिया गया है। पुलिस फरार ड्राइवर को ढूंढ लेगी, कानून अपना काम करेगा, पर उन घरों का क्या जहाँ अब कभी कोई ‘प्रेमचंद’ या ‘रियान’ लौटकर नहीं आएगा?
हाईवे की चमक-धमक के बीच टनल के अंधेरे से पहले हुई यह दुर्घटना हमें याद दिलाती है कि जब तक सड़कों पर ‘इंसानियत’ की गति नियंत्रित नहीं होगी, ऐसे ‘स्मृति शेष’ लिखे जाते रहेंगे।
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