जम्मू में पत्रकार अरफ़ाज़ अहमद डैंग के परिवार का मकान जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी (जेडीए) द्वारा गिराए जाने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जेडीए का दावा है कि मकान सरकारी ज़मीन पर बना था और विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए ध्वस्तीकरण किया गया, जबकि परिवार का कहना है कि उन्हें न कोई नोटिस मिला, न सामान निकालने का मौका।
कार्रवाई के दौरान पत्रकार ने की लाइव रिपोर्टिंग
अरफ़ाज़, जो ‘सहर न्यूज़ इंडिया’ नाम से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म चलाते हैं, कार्रवाई के वक्त मौके पर मौजूद थे और उन्होंने पूरी घटना की लाइव रिपोर्टिंग की। पत्रकार का आरोप है कि उनके पत्रकारिता के काम से नाराज़ होकर प्रशासन ने टार्गेट किया है।
वहीं उनके पिता ग़ुलाम क़ादिर का कहना है कि वह चालीस साल से जम्मू में रह रहे हैं और मेहनत-मज़दूरी कर परिवार चला रहे हैं। उनका दावा है कि “अगर नोटिस होता, तो हमें जानकारी जरूर मिलती।”
एकतरफ़ा कार्रवाई पर राजनीतिक सवाल
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि बिना चुनी हुई सरकार की अनुमति के जेडीए अफ़सरों द्वारा कार्रवाई करना “सरकार को बदनाम करने की साज़िश” हो सकती है। उन्होंने पूछा कि “क्या जेडीए की ज़मीन पर सिर्फ़ इसी एक व्यक्ति ने कब्ज़ा किया था?”
दूसरी ओर बीजेपी नेताओं ने एलजी प्रशासन की भूमिका से इनकार करते हुए कहा कि बुलडोज़र भेजने का आदेश राज्यपाल की ओर से नहीं दिया गया।
ध्वस्तीकरण में कोई भी जिम्मेदारी लेने से बचता दिखा प्रशासन
जहां जेडीए अधिकारी आधिकारिक बयान देने को तैयार नहीं, वहीं एलजी प्रशासन ने भी अब तक इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
हिंदू परिवार ने पेश की मिसाल, पत्रकार को दी अपनी ज़मीन
इस विवाद के बीच एक मानवीय पहल ने पूरे मामले को नई दिशा दी है। जम्मू के रहने वाले पूर्व सैनिक कुलदीप शर्मा, जो हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, ने पत्रकार अरफ़ाज़ को अपनी ज़मीन का प्लॉट गिफ़्ट कर दिया।
शर्मा ने बताया कि वीडियो देखकर उनकी बेटी तक रो पड़ी। “मुझे लगा कि यह मुस्लिम भाई नहीं, मेरा इंसानी भाई है। इंसानियत ही सबसे बड़ी पहचान है।“
शर्मा की बेटी तनाया ने कहा कि उन्हें ‘हिंदू ने ज़मीन दी’ जैसे बयानों पर अफसोस है— “हमने इंसानियत के लिए किया है, धर्म के लिए नहीं।”
खुले आसमान के नीचे रह रहा परिवार
मकान गिराए जाने के बाद परिवार सड़क पर आ गया है। कई स्थानीय लोग सुबह-शाम खाना पहुंचा रहे हैं। अरफ़ाज़ की मां ध्वस्त घर को देखकर लगातार स्तब्ध दिखाई देती हैं।
अरफ़ाज़ कहते हैं, “एक मुस्लिम परिवार का घर टूटा, और एक हिंदू भाई ने ज़मीन दी— इससे बड़ा भाईचारे का संदेश और क्या हो सकता है?”
एक ओर जहां यह घटना प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाती है, वहीं दूसरी ओर इंसानियत और भाईचारे की मिसाल भी पेश करती है। ध्वस्तीकरण की ज़िम्मेदारी किसकी थी, और क्या सही प्रक्रिया अपनाई गई — इन सवालों के जवाब अब भी लंबित हैं।
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