
नई दिल्ली। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीमापार आतंकवाद के खिलाफ भारत की लगातार लड़ाई’ के संदर्भ में भारत सरकार ने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गठित किया है, जिसका उद्देश्य भारत के प्रमुख साझेदार देशों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों का दौरा करके आतंकवाद पर भारत का रुख स्पष्ट करना है। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर को एक टीम का नेतृत्वकर्ता बनाया गया, जिस पर विवाद खड़ा हो गया।
विवाद की जड़ : कांग्रेस ने कहा “नाम ही नहीं दिया”
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि पार्टी की ओर से जिन चार सांसदों के नाम विदेश प्रतिनिधिमंडल के लिए दिए गए थे, उनमें शशि थरूर शामिल नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि: “कांग्रेस की ओर से आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, डॉ. सैयद नासिर हुसैन और राजा बरार के नाम शुक्रवार दोपहर तक दिए गए थे।”
इसका मतलब हुआ कि शशि थरूर का नाम सरकार ने खुद चुना, न कि कांग्रेस पार्टी ने सुझाया।
शशि थरूर की प्रतिक्रिया : शशि थरूर ने इस घटनाक्रम पर एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा-“भारत सरकार के निमंत्रण से सम्मानित महसूस कर रहा हूं। जब बात राष्ट्रीय हित की हो और मेरी सेवाओं की ज़रूरत हो, तो मैं कभी पीछे नहीं हटूंगा।”
यह बयान साफ करता है कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में स्वीकार किया है, न कि किसी दलगत राजनीति के तहत।
बीजेपी ने उठाए कांग्रेस पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर सवाल उठाए। भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर कहा-“शशि थरूर की वाकपटुता, यूएन में अनुभव और विदेश मामलों की समझ को नकारा नहीं जा सकता। फिर राहुल गांधी ने उन्हें क्यों नहीं नामित किया? क्या ये असुरक्षा है? जलन है? या फिर हाईकमान से बेहतर लोगों को असहनीय मानने की आदत है?”
बीजेपी का तर्क है कि कांग्रेस ने काबिल व्यक्ति को नजरअंदाज किया, और ये इस बात का संकेत है कि पार्टी में नेतृत्व से बेहतर दिखने वालों को बढ़ावा नहीं मिलता।
हिमंता बिस्वा सरमा का कटाक्ष
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी इस विवाद में कूदते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा, हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया। उन्होंने लिखा-
“इस लिस्ट में उस सांसद का नाम शामिल है जिन्होंने पाकिस्तान में कथित रूप से दो हफ्ते रहने को खारिज नहीं किया। राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में ऐसे व्यक्तियों को रणनीतिक जिम्मेदारियों से दूर रखना चाहिए।”
यह टिप्पणी गौरव गोगोई की ओर इशारा कर रही थी, जो कांग्रेस की ओर से भेजे गए चार नामों में शामिल थे।
सरकार की मंशा क्या है?
भारत सरकार ने सात अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों का गठन किया है, जो आतंकवाद और भारत के सुरक्षा दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रखेंगे। इन दलों में विभिन्न दलों के नेता शामिल हैं:
शशि थरूर (कांग्रेस), रविशंकर प्रसाद (बीजेपी), संजय कुमार झा (जदयू), बैजयंत पांडा (बीजेपी), कनिमोझी करुणानिधि (डीएमके), सुप्रिया सुले (एनसीपी – शरद गुट), श्रीकांत शिंदे (शिवसेना – शिंदे गुट)।
इससे सरकार यह संकेत देना चाहती है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सभी दल एकजुट हैं, और भारत की नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है।
कांग्रेस ने कहा-शशि थरूर का नाम पार्टी ने नहीं दिया। शशि थरूर बोले-राष्ट्रीय हित में बुलावा मिला, स्वीकार किया। बीजेपी ने कहा-कांग्रेस ने काबिल नेता को नजरअंदाज किया, नेतृत्व की असहिष्णुता दिखती है। सरकार सभी पार्टियों को शामिल कर सर्वदलीय एकता दिखाना चाहती है।
इस पूरे विवाद से यह साफ होता है कि एक तरफ सरकार आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति मजबूत करना चाहती है, तो दूसरी ओर विपक्ष में इस प्रक्रिया की संवेदनशीलता को लेकर असहमति है। शशि थरूर जैसे अनुभवी नेता का नाम शामिल करना, भले ही कांग्रेस की सहमति के बिना हुआ हो, सरकार की रणनीतिक सोच को दर्शाता है, लेकिन इससे दलगत राजनीति में विवाद भी पैदा हो गया है।
यह मामला बताता है कि राष्ट्रीय हित के नाम पर शुरू हुआ एक प्रयास भी राजनीति की खींचतान में उलझ सकता है, खासकर जब संवाद की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो जाएं।
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