
उदयपुर की धरती रविवार को गर्व, गौरव और उम्मीदों की गवाह बनी, जब समाज ने अपने ही बीच से निकलकर न्याय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उठाने वाली बेटियों का अभिनंदन किया। यह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस सामाजिक बदलाव का प्रतीक था जिसमें बेटियां अब सिर्फ घर की देहरी तक सीमित नहीं, बल्कि न्याय की कुर्सी तक पहुंच रही हैं – पूरे आत्मविश्वास और अधिकार के साथ।
पश्चिमी राजस्थान अग्रवाल सम्मेलन के आयोजन में जब राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस विनीत माथुर ने मंच से कहा कि “सच्चा न्याय वही है जो सत्य, करुणा और विवेक से जन्म ले”, तो यह केवल एक कानूनी विचार नहीं, बल्कि आज के समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत का उद्घोष था। न्याय केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि समाज के दिलों में भी जगह बनाता है – और इस न्याय की पहचान बनीं ये 10 बेटियां और एक युवा बेटा, जो हाल ही में RJS परीक्षा पास कर न्यायाधीश बने।
बेटियों की जीत, पूरे समाज की जीत
कार्यक्रम में जब मंच से उन बेटियों के नाम पुकारे गए – पायल, कनक, कृतिका, मेहक, निनाशा, नूपुर, आयुषी, पूनम, तनवी – तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज की आंखों में गर्व की चमक थी। इन नामों में वो संघर्ष छिपा है जो समाज की पुरानी रूढ़ियों से लड़कर आगे बढ़ा है। इन चेहरों पर वो आत्मविश्वास है जिसने यह साबित कर दिया कि “बेटी पढ़ेगी तो देश बढ़ेगा” कोई नारा नहीं, एक सच्चाई है।
यह क्षण न केवल उनके लिए विशेष था, बल्कि उन सभी माता-पिताओं के लिए भी जो बिना किसी शर्त के अपनी बेटियों के सपनों के पीछे खड़े रहे। यह दिन हर उस शिक्षक के लिए प्रेरणा है, जिसने बिना भेदभाव के ज्ञान बांटा, और हर उस सामाजिक संगठन के लिए मार्गदर्शक है जो बेटियों के लिए बेहतर भविष्य की राह बना रहे हैं।
सामाजिक सहयोग और दान का नया चेहरा
पश्चिमी राजस्थान अग्रवाल सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा “समाज की प्रतिभाओं को सिविल सर्विसेज या उच्च शिक्षा के लिए हर संभव मदद दी जाएगी,” तो वह केवल एक आश्वासन नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी का सार्वजनिक ऐलान था। जब समाज अपने प्रतिभाशाली बच्चों की उड़ान में पंख देता है, तब एक समरस और समृद्ध राष्ट्र की नींव रखी जाती है।
यह बहुत मायने रखता है कि समाज के दानदाता आगे आ रहे हैं – बिना किसी प्रचार या अपेक्षा के। यह दर्शाता है कि सामाजिक पूंजी अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और भावनात्मक भी हो रही है। यह सहयोग एक नई पीढ़ी को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ने की दिशा में मील का पत्थर है।
जहां महिलाएं न्याय करें, वहां अन्याय को डर लगना चाहिए
कार्यक्रम में जब जस्टिस विनीत माथुर ने कहा कि “न्याय होते हुए दिखना चाहिए”, तब उन्होंने एक बहुत गहरी बात कही। न्याय की प्रक्रिया में पारदर्शिता और भरोसे की जो कमी अक्सर समाज महसूस करता है, उसका समाधान तब होता है जब हमारी बेटियां, हमारे बीच की लड़कियां, न्याय की कुर्सी पर बैठती हैं।
उनकी उपस्थिति ही आश्वस्त करती है कि भावनाओं को समझने वाला, संवेदनशील न्याय अब संभव है। एक महिला जज सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करती, वह पीड़ित की पीड़ा को भी महसूस कर सकती है। यही वह बदलाव है जिसकी ओर भारत का न्यायिक ढांचा बढ़ रहा है – और यही बदलाव उदयपुर की इस ऐतिहासिक शाम में देखा गया।
सम्मान समारोह में समग्र समाज की भागीदारी
इस गौरवपूर्ण अवसर पर मंच पर राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधिपति मनोज गर्ग, भीलवाड़ा सांसद दामोदर अग्रवाल, उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा और उदयपुर एसपी योगेश गोयल की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक गरिमामय बना दिया। यह कार्यक्रम किसी एक संस्था का नहीं, पूरे समाज का उत्सव बन गया।
यह दिखाता है कि जब सरकारी तंत्र, समाजसेवी संगठन और आमजन मिलकर किसी शुभ कार्य को बढ़ावा देते हैं, तो न केवल सफलता मिलती है, बल्कि उसकी गूंज पीढ़ियों तक सुनाई देती है।
बेटियों ने लिखी न्याय की नई इबारत
उदयपुर की इस शाम ने सिर्फ 11 नव-न्यायाधीशों को सम्मानित नहीं किया, बल्कि पूरे देश को एक संदेश दिया – “अब समय आ गया है कि बेटियां न केवल कानून पढ़ें, बल्कि कानून को जीएं, समझें और समाज को न्याय दें।”
इन बेटियों की यात्रा उन हजारों लड़कियों के लिए आशा की किरण है, जो छोटे कस्बों और शहरों में बड़े सपने लिए मेहनत कर रही हैं। और यह समाज के लिए एक प्रेरणा है कि अगर हम साथ दें, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रह सकता।
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