फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। भारतीय नववर्ष संवत 2082 के शुभारंभ पर उदयपुर की धरा पर भक्ति, उत्साह और राष्ट्रप्रेम की त्रिवेणी बह उठी। भारतीय समाजोत्सव समिति के तत्वावधान में निकाली गई भव्य शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। यह शोभायात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि संस्कृति का गौरवगान और स्वाभिमान का जागरण भी थी।
नववर्ष के इस मांगलिक अवसर पर महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में मंगल गीतों का गुंजार किया, तो संत-महंतों के सान्निध्य ने वातावरण को आध्यात्मिक आभा से भर दिया। सजी-धजी बग्घियों में संतों की शोभायात्रा किसी पौराणिक युग का आभास करा रही थी। वहीं, भारत माता की भव्य झांकी, भगवा ध्वजों की शान और देशभक्ति के नारों की गूंज ने पूरे शहर को राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कर दिया।

श्रद्धा, आस्था और उल्लास से भरा शोभायात्रा का मार्ग
गांधी ग्राउंड से आरंभ हुई यह शोभायात्रा हाथीपोल, देहलीगेट, बापू बाजार, सूरजपोल, टाउन हॉल होते हुए नगर निगम प्रांगण तक पहुंची। पूरे मार्ग पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी, पुष्पवर्षा से स्वागत हुआ और जयघोष से नगर गूंज उठा।
विशेष रूप से मातृशक्ति की मंगल कलश यात्रा ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। सिर पर कलश धारण किए स्त्रियां शुभकामनाओं और मंगलाचार के स्वर बिखेर रही थीं, तो युवाओं ने शौर्य और उल्लास के साथ भगवा ध्वज फहराए।

सांस्कृतिक झांकियां बनीं आकर्षण का केंद्र
शोभायात्रा में सामाजिक चेतना और राष्ट्रभक्ति को समर्पित भव्य झांकियां निकाली गईं। इनमें महाकाल, श्रीराम दरबार, मां दुर्गा, भारत माता, पंच परिवर्तन, अहिल्याबाई होल्कर की सेवा समरसता, ग्राम विकास एवं पर्यावरण संरक्षण, प्रयागराज महाकुंभ, स्वावलंबन और साक्षरता अभियान जैसी झांकियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनीं।
अखाड़ों के जांबाजों ने जब अपने हैरतअंगेज करतब दिखाए, तो पूरा शहर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों की ध्वनि और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के मधुर सुरों ने पूरे वातावरण को उल्लासमय बना दिया। विभिन्न समाज-समूहों द्वारा स्वागत द्वारों से शोभायात्रा का अभिनंदन किया गया और जगह-जगह शीतल पेय और प्रसाद वितरण की व्यवस्था ने आयोजन को और भी भव्य बना दिया।

भारतीय संस्कृति के गौरवशाली नवचेतना का पर्व
इस आयोजन ने भारतीय नववर्ष की पावन परंपरा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। यह केवल एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि संस्कृति, धर्म, समाज और राष्ट्रप्रेम का उत्सव था। यह आयोजन नवसंवत्सर के नवप्रभात का संदेश लेकर आया, जिसमें केवल उल्लास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का गौरव और सामाजिक समरसता का संदेश भी समाहित था।




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