
अलवर। रविवार की रात अलवर का माहौल शांत था। शहर की गलियों में लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन पुलिस की खुफिया नजरें एक ऐसे गिरोह पर टिकी थीं, जिसने ऑनलाइन दुनिया को लूट का अड्डा बना रखा था। सूचना पक्की थी—एक सफेद बोलेरो में बैठे कुछ लोग करोड़ों की साइबर ठगी के धंधे में शामिल हैं।
डीएसटी प्रभारी क़ासम खां और उनकी टीम धीरे-धीरे बताए गए स्थान, जे.एस. फोरव्हील कंपनी के पीछे, दबिश देने पहुँची। वहां खड़ी बोलेरो में छह चेहरे पुलिस की नजरों में आए। जैसे ही टीम ने गाड़ी को घेरा, भीतर बैठे युवकों के चेहरों पर खामोश बेचैनी तैर गई।
जब मोबाइल फोन खंगाले गए तो डिजिटल दुनिया के अंधेरे राज़ खुलने लगे। चैट्स, ट्रांजैक्शन और बैंक अकाउंट्स की लंबी लिस्ट—यह महज़ संयोग नहीं था। पुलिस ने गाड़ी, मोबाइल और एटीएम कार्ड जब्त कर लिए और आरोपियों को थाने ले आई।
पूछताछ शुरू हुई तो परत-दर-परत गिरोह का सच सामने आने लगा। यह कोई साधारण गैंग नहीं था, बल्कि एक ऐसा नेटवर्क था जो बैंक खाते खरीदकर उन्हें साइबर ठगों तक पहुँचाता था। कमीशन पर पैसे निकलवाए जाते और फिर देशभर के अलग-अलग राज्यों में बैठे ठगों तक रकम पहुंचाई जाती। इन खातों के जरिए अब तक 85 लाख रुपये की ठगी हो चुकी थी।
गिरफ्तार किए गए चेहरों के पीछे अलग-अलग गांवों की पहचान थी—अलवर से लेकर हरियाणा और डीग तक। नाम थे—शाहरुख खान, शाहरुख, कुर्बान अली, दाऊद, रईस और जुमरत। पुलिस ने इन्हें सलाखों के पीछे भेज दिया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी भर कहानी का अंत नहीं थी।
साइबर ठगी का यह जाल बड़ा है, और इन छह नामों से शुरू होकर न जाने कितने अज्ञात चेहरों तक फैला है। अलवर पुलिस ने भले ही एक बड़ी सफलता हासिल की हो, मगर असली चुनौती अब भी बाकी है—इस गिरोह की जड़ों तक पहुंचना और डिजिटल अपराध की उस अंधेरी सुरंग को रोशनी में लाना, जिसमें हर दिन हजारों लोग फँसते जा रहे हैं।
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