
उदयपुर से 45 किमी दूर गोगुंदा के जंगल में रात की स्याही गहराते ही जंगल के सन्नाटे में कुछ बदल गया। हवा में खून की गंध तैरने लगती है। जिस पैंथर का शिकार करना है, वो अब तक 9 इंसानों की बली ले चुका था। लोग एक तरफ अपनी ज़िंदगियों को लेकर कांप रहे थे, दूसरी तरफ प्रशासन की लाचारी पर थूक रहे हैं। उसे जिंदा पकड़ने की उम्मीदें जब खत्म हो गई तो गोली से उड़ाना ही एकमात्र रास्ता बचा है। जंगल में पुलिस, वनकर्मी और शिकारी दिन रात गश्त कर रहे हैं, लेकिन पैंथर उनकी जद से बाहर है। मौका पाकर वो ग्रामीणों पर हमला कर लगातार इन एक्सपर्ट को चुनौती दे रहा है।
पैंथर के हमले में हर रोज दर्दनाक चीख में सुनाई दे रही है, पैंथर हर बार छिपकर निकल जाता है। वन विभाग के अफसर, जो पहले इसे एक सामान्य घटना मान रहे थे, अब खुद को घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। गांव की गलियों में बस एक सवाल गूंज रहा था—यह खौफनाक खेल कब खत्म होगा?
पुलिस के सशस्त्र जवानों और वन विभाग के अधिकारी उसे हर हाल में घेरने की कोशिश में जुटे हैं। मगर वो आदमखोर भी किसी शिकारी से कम नहीं है—सुराग छोड़ता नहीं, सिर्फ खून के धब्बे छोड़ जाता है। लोगों की चीखें और मातम की आवाजें अब जंगल के अंधेरे में घुलने लगी हैं। हर रोज कोई न कोई उसकी दरिंदगी का शिकार बनता।
बड़ी-बड़ी योजनाएं, ड्रोन कैमरे, ट्रैकिंग सिस्टम—सभी फेल हो चुके हैं। जंगल के उस बेताज बादशाह ने सरकारी मशीनरी की धज्जियां उड़ा दी। लोग सिर्फ सवाल कर रहे थे—अगर यही था सरकारी इंतज़ाम, तो क्यों नहीं उसे पहले पकड़ा गया? जंगल के ये पहरेदार क्या सिर्फ नाम के हैं?
“गोली मारने का आदेश है!” वन विभाग के अधिकारी ने थके हुए चेहरे से कहा, मानो अब उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझ चुकी हो। लेकिन डर की घुटन और गांववालों की चीखों ने अधिकारियों को विवश कर दिया। जब कानून और नियम किसी बेबस पिंजरे में फंसे हों, तब एक इंसान की जिंदगी के आगे क्या मायने रह जाते हैं?
लेकिन इस खेल में एक बड़ा सवाल छूट गया था—आखिर यह पैंथर आदमखोर बना क्यों? क्या इसके पीछे प्रशासन की अनदेखी है? जंगल के बेतहाशा कटाव, इंसानों के पांव पसारते हुए अतिक्रमण ने इस खूनी खेल को जन्म दिया, या यह सिर्फ एक नियति का खेल है? गांव के हर कोने में अब सिर्फ खौफ और इंतज़ार था—कब वो आखिरी चीख सुनाई देगी, और कब इस खूनी कहानी का अंत होगा।
जंगल में अब इंसान का आतंक नहीं, पैंथर का राज है।
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