
उदयपुर। आज के समय में प्रदूषण की समस्या ने अनेक रूप धारण कर लिए हैं, जो न केवल हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि हमारे मानसिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रभावित कर रही है। विजयदशमी के शुभ अवसर पर, पर्यावरणविद डॉ. अनिल ने समाज को इन दस प्रदूषण स्वरूपों के खिलाफ खड़े होने और उन्हें नष्ट करने का संदेश दिया है।

- विचारों में प्रदूषण: लालच, लोभ, और तृष्णा जैसी भावनाओं का मनोविकार हमारे समाज को भीतर से खोखला कर रहा है।
- जल स्रोतों का अतिक्रमण: सतही और भूजल स्रोतों पर अत्यधिक दोहन, गंदगी और सीवर के कचरे का विसर्जन जल की गुणवत्ता को नष्ट कर रहा है।
- मिट्टी की गुणवत्ता में हानि: प्लास्टिक और अन्य रासायनिक पदार्थों से मिट्टी की उर्वरता समाप्त हो रही है, जिससे कृषि योग्य भूमि बंजर हो रही है।
- कंक्रीट का बढ़ता प्रभाव: बढ़ती कंक्रीट की चादर ने मिट्टी की श्वास प्रक्रिया को रोक दिया है, जिससे मिट्टी की मृत्यु हो रही है।
- पहाड़ों की कटाई: प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग पहाड़ों का अस्तित्व समाप्त कर रहा है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो रहा है।
- जंगलों का विनाश: जंगलों की लगातार कटाई के कारण वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं और पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है।
- वायु प्रदूषण: वाहनों, फैक्ट्रियों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली विषैली गैसें वायु को विषाक्त बना रही हैं, जिससे जनस्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
- ध्वनि प्रदूषण: अत्यधिक शोर से मानव मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे मानसिक तनाव और अन्य बीमारियां बढ़ रही हैं।
- भोजन की बर्बादी: जूठन और अनावश्यक भोजन की बर्बादी खाद्य संकट को बढ़ावा दे रही है, जबकि कई लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।
- सांस्कृतिक प्रदूषण: पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास और विदेशी अपसंस्कृति का अतिक्रमण समाज को उसकी जड़ों से दूर कर रहा है।
विजयदशमी के इस पर्व पर अनिल ने सभी से इन दस प्रकार के प्रदूषणों का दहन करने और एक स्वच्छ, लालच और लोभ मुक्त समाज की स्थापना करने का संकल्प लेने का आह्वान किया है।
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