
उदयपुर। उदयपुर में ‘उदयपुर फाइल्स’ और उसके बाद अब ‘कथित ऑडियो’ ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। यह घटनाक्रम आगामी चुनावों और पार्टी की सांगठनिक मजबूती के लिहाज से कई महत्वपूर्ण संकेत देता है।
आमतौर पर अनुशासित मानी जाने वाली भाजपा में जब विवाद थाने तक पहुंच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जिला मंत्री तुषार मेहता द्वारा अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मोर्चा खोलना यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर ‘भरोसे की भारी कमी’ है।
पर्दे के पीछे का वीडियो कांड : एक रहस्यमयी सुगबुगाहट
उदयपुर की राजनीति में ‘वीडियो कांड’ एक ऐसा मुद्दा है जो सार्वजनिक रूप से तो दिखाई नहीं दिया, लेकिन इसकी चर्चाओं ने संगठन की नींव हिला दी है।
चुनिंदा लोगों तक पहुंच : चर्चा है कि ये वीडियो सार्वजनिक रूप से वायरल नहीं हुए हैं, लेकिन पार्टी के कुछ चुनिंदा और प्रभावशाली लोगों ने इन्हें देखा है। यही वजह है कि यह मुद्दा ‘दिखने’ से ज्यादा ‘महसूस’ किया जा रहा है।
विधानसभा में गूंज: इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाकर भाजपा को घेरा था। विपक्ष द्वारा इसे “नैतिक पतन” के रूप में पेश करने से सत्ताधारी दल रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है।
ऑडियो कांड और ‘मैनेजमेंट’ का आरोप
हाल ही में जिला मंत्री तुषार मेहता का जो ऑडियो सामने आया है, उसे इसी वीडियो कांड की अगली कड़ी माना जा रहा है। आरोप है कि इस ऑडियो में पूरे मामले को ‘मैनेज’ करने की कोशिशों पर चर्चा हो रही है।
पार्टी की साख पर सवाल: नाराज गुट का सबसे बड़ा तर्क यही है कि जब मामला इतना गंभीर है और विधानसभा तक पहुँच चुका है, तो कार्रवाई के बजाय ‘मैनेजमेंट’ की बातें क्यों हो रही हैं?
‘पारिवारिक’ ढांचा या आपसी टकराव?
पिछले कुछ दिनों से उदयपुर के राजनैतिक गलियारों में एक और खबर गर्म है कि मौजूदा पदाधिकारियों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई की नौबत तक आ गई थी।
नेताओं का इनकार: जब इस बारे में संबंधित पदाधिकारियों से पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही संजीदगी से इसे नकार दिया। उनका कहना था, “हम एक ही वैचारिक परिवार के लोग हैं, भला हमारे बीच हाथापाई कैसे हो सकती है?” * अन्तर्विरोध: हालांकि, नेताओं का ‘परिवार’ वाला तर्क अपनी जगह है, लेकिन जिस तरह से एक गुट ने थाने में शिकायत दी और दूसरा गुट लिखित शिकायत लेकर जयपुर (प्रदेश प्रभारी) पहुँच गया, वह इस ‘पारिवारिक प्रेम’ की हकीकत को बयां करने के लिए काफी है।
शक्ति प्रदर्शन और ‘आर-पार’ की लड़ाई
शहर विधायक ताराचंद जैन के नेतृत्व में जिस तरह से पूर्व जिलाध्यक्षों और पार्षदों की फौज ने प्रदेश प्रभारी राधामोहन दास अग्रवाल के सामने अपनी बात रखी है, वह स्पष्ट रूप से संगठन बनाम विधायक की लड़ाई को दर्शाता है। नाराज गुट का साफ कहना है कि ‘डर्टी फाइल्स’ की वजह से जनता के बीच पार्टी का ग्राफ गिर रहा है और बिना ‘सर्जरी’ के सुधार मुमकिन नहीं है।
साख बचाने की चुनौती
उदयपुर भाजपा इस समय ‘दोराहे’ पर खड़ी है। एक तरफ वर्तमान संगठन है जो अपनी छवि को साजिश से बचाने की कोशिश कर रहा है, और दूसरी तरफ वह धड़ा है जो नैतिक आधार पर कड़े फैसलों की मांग कर रहा है।
बड़ा सवाल : क्या प्रदेश नेतृत्व इस गुटबाजी को शांत करने के लिए कोई कठोर कदम उठाएगा, या फिर ‘हम सब एक परिवार हैं’ के नारे के पीछे इन विवादों को दबा दिया जाएगा? विधानसभा में विपक्ष के हमलों ने इस मामले को भाजपा के लिए एक ‘राजनैतिक फांस’ बना दिया है।
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