
सूरज ढलने को था, पर उदयपुर की सड़कों पर हलचल थमी नहीं थी। शहर के युवा कांग्रेस कार्यकर्ता अपनी नई योजना पर अमल करने के लिए तैयार थे। शहर की गलियों में फैली गंदगी और नगर निगम की उदासीनता से परेशान होकर उन्होंने एक साहसिक कदम उठाने की ठानी थी।
सिद्धार्थ सोनी और नीरज मेघवाल, युवा कांग्रेस के उत्साही नेता, अपने साथियों के साथ हर वह गली और सड़क खंगाल रहे थे जहां कचरे के ढेर लगे थे। रमेश मेघवाल, आदित्य शर्मा, चंदन, हार्दिक तेली, देव खंडेलवाल, दिलीप और बंटी परमार जैसे जोशीले युवा इस मुहिम का हिस्सा बने। कचरे को एकत्र किया गया गया और हर कोई इस अनोखे विरोध की गंभीरता को समझने लगा।
जब रात का सन्नाटा गहराने लगा, यह टोली नगर निगम के महापौर के घर के सामने पहुंची। उनके हाथों में नारे लिखी तख्तियां थीं और दिलों में गुस्सा। “जब शहर संभल नहीं सकता, तो महापौर निवास क्यों चमकता है?” सिद्धार्थ ने जोर से आवाज लगाई। देखते ही देखते, एकत्र किया गया कचरा महापौर के द्वार के सामने डाल दिया गया।
चारों ओर कचरे की बदबू और कार्यकर्ताओं के नारे गूंज रहे थे। यह सिर्फ गुस्से का इजहार नहीं था, बल्कि जनता के दर्द और उदासी की गूंज थी। उन्होंने मांग की कि तुरंत कंटेनर लगाए जाएं और कचरा उठाने की व्यवस्था सुधारी जाए।
महापौर निवास के बाहर का दृश्य शहर की व्यवस्था पर एक तीखा सवाल बनकर उभरा। प्रदर्शनकारियों ने अपनी बात में दम डालते हुए चेतावनी दी, “अगर हमारी मांगे पूरी नहीं हुईं, तो अगला प्रदर्शन और बड़ा होगा।”
शहर की जनता, जो अब तक कचरे और दुर्गंध की मार झेल रही थी, इस साहसी कदम को सराह रही थी। यह कहानी न केवल एक विरोध की, बल्कि नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता और बदलाव की पुकार बन गई।
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