डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ बोले- “आदिकाल से ही कला संरक्षण में अग्रणी रहा है मेवाड़”

उदयपुर। मेवाड़ की ऐतिहासिक भूमि एक बार फिर जनजातीय कला और संस्कृति के संरक्षण की साक्षी बनी, जब शुक्रवार को सिटी पैलेस परिसर में तीन दिवसीय जनजातीय कला प्रदर्शनी का भव्य शुभारंभ हुआ। माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई) तथा महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी का उद्घाटन संभागीय आयुक्त सुश्री प्रज्ञा केवलरमानी, टीएडी आयुक्त शक्तिसिंह राठौड़ तथा पूर्व राजपरिवार के सदस्य डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किया।
डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने उद्घाटन समारोह में कहा, “आदिकाल से ही मेवाड़ कलाओं का पोषक रहा है। हमारे पूर्वजों ने कलाकारों को संरक्षण व प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज फिर से इस भूमिका का निर्वहन करना गौरव का विषय है।” उन्होंने यह भी कहा कि मेवाड़ राजपरिवार का जनजातीय समाज की कला-संस्कृति से गहरा आत्मीय जुड़ाव है, जो आज भी जीवित परंपरा के रूप में सामने आता है।
जनजातीय कलाओं की विविधता का प्रदर्शन
इस प्रदर्शनी में टीआरआई के अंतर्गत संचालित बनफूल आर्ट स्टूडियो के कलाकारों सहित अन्य जनजातीय चित्रकारों, मांडना कलाकारों, काष्ठ शिल्पकारों और भित्ति चित्र निर्माताओं की कृतियों को प्रदर्शित किया गया है। कैनवास, पक्षियों के पंखों, कपड़ों और लकड़ी पर उकेरी गई इन कलाकृतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। पर्यटकों ने इन कलाओं को न केवल सराहा, बल्कि कई ने कलाकृतियों को खरीद कर कलाकारों को सीधे आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया।

प्रशासनिक सहयोग और राज्य सरकार की भूमिका
संभागीय आयुक्त प्रज्ञा केवलरमानी ने कहा, “जनजातीय अंचल की महिलाएं जिस तरह अपने घरों की दीवारों पर मांडना रचती हैं, वह लोक कलाओं का अद्वितीय उदाहरण है। इस तरह के आयोजनों से उन्हें प्रोत्साहन और व्यापक पहचान मिलती है।”
इस अवसर पर यह भी उल्लेखनीय रहा कि राज्य सरकार, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में, प्रदेश की लोककलाओं के संरक्षण हेतु सतत कार्य कर रही है। जनजातीय क्षेत्रीय विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी के निर्देशन में टीआरआई संस्थान द्वारा संचालित बनफूल स्टूडियो इसका जीवंत प्रमाण है।
पर्यटकों में उत्साह और कलाकारों को मिला संबल
प्रदर्शनी में बड़ी संख्या में देसी-विदेशी पर्यटक पहुंचे और आदिवासी लोक जीवन पर आधारित चित्रों को गहराई से देखा। मांडना, पंख चित्रकला, लकड़ी की कलाकृतियां, और भित्ति चित्रों में निहित भावों को समझने का प्रयास करते हुए कई पर्यटकों ने कलाकारों से संवाद भी किया और उनके कार्यों को सराहा।
सांस्कृतिक साझेदारी का उदाहरण
प्रदर्शनी का आयोजन न केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा, बल्कि यह मेवाड़ की उस परंपरा का विस्तार भी है, जो जनजातीय समाज को अपनी विरासत का अभिन्न अंग मानती है। महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन और टीआरआई की यह साझेदारी जनजातीय कलाकारों को मंच देने और उनकी कला को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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