
उदयपुर | कहानी किसी सस्पेंस फिल्म जैसी है, जहां एक तरफ ‘हनीट्रैप’ और ‘धोखाधड़ी’ के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस महकमे के भीतर चल रही वर्चस्व की जंग। उदयपुर के इस ‘वीडियो कांड’ ने न केवल बीजेपी की साख को दांव पर लगा दिया है, बल्कि खाकी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुलिस की चार्जशीट ने एक ऐसी चिंगारी छोड़ी है जिसने बीजेपी के भीतर आग लगा दी है। मीडिया रिपोर्टस में चार्जशीट के हवाले से बताया कि 29 जनवरी 2026 की दोपहर 3:25 बजे की एक रिकॉर्डिंग में बीजेपी की पीड़ित महिला नेता के साथ एक ‘अज्ञात व्यक्ति’ आपत्तिजनक अवस्था में नजर आ रहा है।
सस्पेंस : आखिर वो शख्स कौन है? क्या वो पार्टी का कोई बड़ा पदाधिकारी है या कोई रसूखदार कार्यकर्ता? सूत्रों की मानें तो उस व्यक्ति का पीड़िता के ऑफिस में ‘घर जैसा’ आना-जाना था। पुलिस ने चार्जशीट में उसकी मौजूदगी की बात तो लिखी है, लेकिन नाम का खुलासा न होने से ‘उदयपुर की फाइलों’ में सस्पेंस और गहरा गया है।
खाकी की ‘कोल्ड वॉर’ : डीएसपी बनाम एएसपी
मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक इस केस की जांच किसी थ्रिलर से कम नहीं रही। जब जांच अधिकारी डीएसपी गोपाल चंदेल पर सवाल उठे, तो पीएचक्यू (PHQ) से आदेश आए कि जांच एएसपी गोपाल स्वरूप मेवाड़ा को सौंपी जाए। लेकिन असली खेल यहीं हुआ। डीएसपी चंदेल ने चार्जशीट पेश होने तक फाइल एएसपी को हैंडओवर ही नहीं की। पूरी जांच खुद ही निपटा दी।
अधिकारियों में खींचतान : चर्चा है कि डीएसपी सीधे आईजी (IG) को रिपोर्ट कर रहे थे, जिससे तत्कालीन एसपी (SP) खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि 60 दिन की मोहलत होने के बावजूद, बवाल से बचने के लिए 17 दिन पहले ही ‘आनंद-फानन’ में चार्जशीट दाखिल कर दी गई।
‘स्पाई वॉच’ और ‘हिडन कैमरा’ : बेडरूम से ऑफिस तक जासूसी
आरोपी के पास से जो सामान मिला, वह किसी शातिर जासूस के पिटारे जैसा है। पुलिस ने बरामद किया है। अजंता की ‘स्पाई घड़ी’: दीवार पर टंगी घड़ी जो समय नहीं, वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी।
ब्लेजर वाला हिडन कैमरा : कोट या शर्ट में छिप जाने वाला डिवाइस।
मोबाइल ऐप्स का मायाजाल : ‘LOOK CAM’ और ‘True Cloud’ जैसे ऐप्स, जिनसे दूर बैठकर भी स्पाई कैमरों की लाइव फीड देखी जा सकती थी। सैमसंग के मोबाइल में पीड़िता के न्यूड वीडियो के कई फोल्डर और सब-फोल्डर मिले हैं।
बीजेपी की चुप्पी और कार्यकर्ताओं का सब्र
पार्टी के भीतर इस वक्त ‘ज्वालामुखी’ सुलग रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिन पदाधिकारियों के नाम या फुटेज इस मामले में सामने आए हैं, उन्हें ‘रीति-नीति’ के हिसाब से खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए था। अब सबकी नजरें हाईकमान पर हैं। क्या पार्टी उन ‘चेहरों’ पर कार्रवाई करेगी जो वीडियो और सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध पाए गए हैं? सुगबुगाहट है कि कुछ बड़े नामों ने इस्तीफे की पेशकश की है, लेकिन ‘ऑपरेशन क्लिन’ कब शुरू होगा, यह अभी भी भविष्य के गर्भ में है।
रिपोर्ट के अनसुलझे सवाल
नाम का राज : चार्जशीट में दर्ज वो ‘अज्ञात’ व्यक्ति क्या किसी बड़े राजनीतिक भूचाल का केंद्र है? क्या डीएसपी द्वारा एएसपी को फाइल न सौंपना किसी को बचाने की कोशिश थी?
पार्टी का स्टैंड : क्या ‘अनुशासित पार्टी’ अपने दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाएगी?
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