उदयपुर। शहर की शांति को तोड़ते हुए बड़गांव थाना क्षेत्र से एक चौंकाने वाली धोखाधड़ी का पर्दाफाश हुआ। एक ऐसी साज़िश, जिसमें असली ज़मीन मालिक को किनारे कर, एक डमी खातेदार महिला को सामने लाकर उसकी ज़मीन बेच डाली गई। यह कहानी केवल ज़मीन के कागज़ों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें चार लोगों की चालाकी, विश्वासघात और लालच की दास्तान छिपी हुई थी।
छोटी उंदरी का नाम सुनते ही लोग सादा ज़िंदगी और गांव की मिट्टी की खुशबू की कल्पना करते हैं। लेकिन इसी गांव की महिला मोहनी गमेती ने अपने साथियों के साथ मिलकर ऐसा खेल खेला, जिससे पूरा इलाक़ा सन्न रह गया।
मुख्य साजिशकर्ता था तुलसीराम उर्फ दिनेश डांगी। ज़मीन पर नज़र तो उसी की थी, लेकिन उसने अपनी चालाकी में बाकी तीनों को शामिल कर लिया। योजना बनी कि असली ज़मीन मालिक काउड़ी गमेती की जगह किसी और को खड़ा किया जाए। और फिर खेल शुरू हुआ—कागज़, गवाह और जाली पहचान का।
तुलसीराम ने मोहनी गमेती को तैयार किया। वह बनी डमी खातेदार।
हीरालाल गमेती को खड़ा किया गया फर्ज़ी गवाह बनकर।
और फिर मन्नाराम गमेती तक यह ज़मीन पहुँचा दी गई, जैसे सबकुछ बिल्कुल असली हो।
रजिस्ट्री में नाम बदला गया, गवाहों को खड़ा किया गया, और सबकुछ कानूनी कागज़ों के पीछे छुप गया। असली मालिक काउड़ी गमेती को भनक तक नहीं लगी कि उसकी आधा बीघा ज़मीन—जो कि अरावली ताज होटल के पास सोने की खान जैसी कीमती थी—अब किसी और के नाम हो चुकी है।
कहानी तब पलटी जब काउड़ी गमेती ने 23 अगस्त 2025 को बड़गांव थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज करवाई। उसने बताया कि उसने अपनी ज़मीन की रजिस्ट्री की नकल निकाली तो आंखें फटी रह गईं। उसमें साफ़ लिखा था कि उसकी ज़मीन तो किसी डमी महिला खातेदार के नाम से हीरालाल गमेती को बेच दी गई है।
गवाहों की सूची में भी नाम अजनबी थे—सुरिता बाई गमेती पत्नी हीरालाल, हीरालाल गमेती पिता मोहन और आगे जाकर वही ज़मीन मुख्तियारनामा के आधार पर 4 जुलाई 2025 को मन्नाराम भील के नाम रजिस्ट्री कर दी गई। इस बार गवाह बने हिम्मतलाल गमेती और वही मास्टरमाइंड—तुलसीराम डांगी।
जैसे ही रिपोर्ट दर्ज हुई, बड़गांव थाना पुलिस हरकत में आई। डीएसपी कैलाश चन्द्र ने पूरी टीम बनाई और एक-एक करके आरोपियों को ढूंढ निकाला। मोहनी गमेती (डमी खातेदार), हीरालाल गमेती (फर्जी गवाह), तुलसीराम उर्फ दिनेश डांगी (मास्टरमाइंड), मन्नाराम गमेती (खरीदार), चारों को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ में सबसे बड़ा राज़ खुला—पूरी साजिश रचने वाला तुलसीराम ही था।
जमीन की कीमत और उसकी लोकेशन देखते ही सभी की आंखें चमक उठी थीं। और लालच ने इन्हें ऐसा अंधा किया कि न दोस्ती देखी, न रिश्तेदारी, न गांव की इज़्ज़त। बस चालाकी से कागज़ों का खेल खेला और आधा बीघा ज़मीन हड़पने की सोची।
लेकिन ज़मीन, जो इंसान की पहचान और मेहनत की निशानी होती है, वही इनके लिए गिरफ्तारी का सबब बन गई।
बड़गांव थाने के लॉकअप में बैठे ये चारों आरोपी अब बार-बार एक ही सवाल सोच रहे होंगे—क्या थोड़े से लालच के लिए इतना बड़ा जोखिम लेना सही था?
क्योंकि जिस ज़मीन को हड़पने के लिए उन्होंने नकली खातेदार और गवाह खड़े किए, वही ज़मीन अब उनके लिए जेल की सलाखों का रास्ता बन गई है।
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