
सैयद हबीब, उदयपुर
जब कोई शख्स ज़िंदगी की किताब को कुछ इस तरह लिख जाए कि हर सफ़्हा किसी तहरीक़ की गवाही बने — तो वक़्त भी उसे मिटा नहीं सकता। डॉ. गिरिजा व्यास, महज़ एक नाम नहीं, बल्कि औरत की सदीयों की ख़ामोश चीख़ को आवाज़ देने वाला एक कारवां थीं।
वो चली गईं… मगर उनकी मौजूदगी आज भी संसद के गलियारों, बस्ती की गलियों, और हर उस आंगन में महूसूस होती है जहां किसी मां, बहन या बेटी ने कभी अन्याय सहा हो।

गिरिजा जी की सियासत किसी सत्ता की लालसा नहीं थी, वो एक खिदमत-ए-ख़ल्क़ थी। उनका राजनीति में आना, आम राजनीतिज्ञों की तरह नहीं था — यह एक ज़िम्मेदारी का अहसास था, जिसे उन्होंने दिल से निभाया। मंत्री बनीं, सांसद बनीं, लेकिन कभी भी “कुर्सी” को खुद पर हावी नहीं होने दिया। जनप्रतिनिधि नहीं, वो आम औरत की “हमसफ़र” थीं।
“डायन प्रथा” के खिलाफ गिरिजा जी की आवाज़ कानूनी दस्तावेज़ बनकर संसद में गूंजी
सड़क से संसद तक उन्होंने जो लड़ाई लड़ी, वो किसी ‘पारंपरिक नेता’ की लड़ाई नहीं थी। वो लड़ाइयां थीं — किसी माँ की, किसी बेटी की, किसी शिक्षिका की। “डायन प्रथा” जैसी वहशियाना कुरीतियों के खिलाफ जब पूरे समाज में खामोशी थी, उस वक़्त गिरिजा जी की आवाज़ कानूनी दस्तावेज़ बनकर संसद में गूंजी। उन्होंने न सिर्फ इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ बिल की मांग की, बल्कि सामाजिक जागरूकता की मशाल भी जलाई। यह एक ऐसे समाज के लिए इंक़लाब था, जहां अंधविश्वास और पितृसत्ता औरतों को जला देती थी।
उनके हाथों ने महिला थानों और महिला डेस्क की नींव रखी, ताकि हर महिला बेझिझक इंसाफ़ मांग सके। उन्होंने पुलिस सिस्टम के भीतर से महिला-संवेदनशीलता को पैदा करने की कोशिश की — ये कोई मामूली बात नहीं थी।
विकास के सफर में भी रहीं अगुवाई में
वो सियासतदां थीं, लेकिन ‘कागज़ों की योजनाओं’ से परे जाकर धरातल पर परिवर्तन लाना जानती थीं। उदयपुर रेलवे लाइन को ब्रॉडगेज करवाने में उनकी कोशिशें इतिहास में दर्ज हैं। बांसवाड़ा को रेलवे से जोड़ना, कांग्रेस शासनकाल में उनके मजबूत हस्तक्षेप के बिना मुमकिन नहीं था।
और वो मंज़र कौन भूल सकता है, जब अकाल के दौरान उदयपुर की झीलें सूख चुकी थीं और शहर प्यासा था? उस समय जयसमंद से पाइपलाइन योजना को उन्होंने महज़ एक विकास परियोजना की तरह नहीं, बल्कि “प्यासों के लिए पानी की इबादत” की तरह देखा — और पूरा करवाया।
लोगों से रिश्ता — एक मां जैसी रहनुमाई

गिरिजा व्यास की सियासत जनसभाओं के नारों और गाड़ियों के काफिलों से नहीं, बल्कि चूल्हों की राख, खेतों की धूल और झुग्गियों की पीड़ा से बनी थी।
हर गांव, हर गली, हर महिला की आंखों में उनके लिए एक उम्मीद पलती थी।
वो मंच से भाषण देने नहीं आती थीं, संवाद करने आती थीं। उनका सियासी सफर, पूर्व पीएम नरसिम्हा राव से लेकर राजीव गांधी, सोनिया गांधी, शरद पवार, नटवर सिंह, प्रणव मुखर्जी और माधवराव सिंधिया तक की क़रीबियों से भरा रहा — लेकिन उनके दिल में जगह सिर्फ जनता के लिए थी।
शिक्षा, कविता और करुणा की त्रिवेणी
गिरिजा जी ने जब विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया था, तब उन्होंने सिर्फ “नॉलेज” नहीं बांटा, बल्कि ज़िंदगी की समझ बांटी। आज भी उनके विद्यार्थी उन्हें “मैम” कहकर आंखें नम कर लेते हैं।
उनकी शायरी और कविताएं, उनके भीतर की करुणा की आवाज़ थीं। वो अल्फ़ाज़ नहीं, एक संघर्षशील नारी का रोजनामचा थीं। उनकी कविता में लफ्ज़ों के मोती नहीं, वक़्त की सियाही और स्त्री के आंसू थे।
सियासी शख्सियत — लेकिन सादगी से लिपटी

वो बार-बार विधायक बनीं, मंत्री बनीं, सांसद बनीं — लेकिन अहंकार का कोई निशान उनकी ज़ात में न था। वो राजनीति को सेवा का ज़रिया मानती थीं, सौदेबाज़ी का नहीं।
उनकी सियासत ‘मुद्दों’ से बंधी थी —सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और ग्रामीण विकास — ये उनके सियासी एजेंडे के मूल में रहे। राजनीति में जब लोग पोस्टर बनकर रह जाते हैं, गिरिजा व्यास एक ज़िंदा किरदार बनी रहीं।
यह श्रद्धांजलि नहीं, एक अहद है
गिरिजा जी अब हमारे बीच नहीं हैं — यह कहना जितना तकलीफ़देह है, उतना ही ज़िम्मेदारी भरा भी। क्योंकि उनकी लड़ाइयों को मुकम्मल अंजाम देना अब हमारी जिम्मेदारी है। उनकी अधूरी तहरीरों को मुकम्मल करना अब हमारी नयी सियासत की कसौटी होगी।
मेवाड़ की उस बेटी को सलाम…
वो सिर्फ उदयपुर की सांसद नहीं थीं, वो उदयपुर की धड़कन थीं। उनका जाना एक युग का जाना है। लेकिन उनका असर —हर महिला डेस्क, हर रेलवे स्टेशन, हर गांव की आंखों में आज भी ज़िंदा है।
“गिरिजा जी चली गईं…
मगर उनकी रहमत, रहनुमाई और रवायत — अब भी हमारे साथ है।
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