
दौसा। 8 अगस्त 2025, शुक्रवार की शाम थी। आसमान में हल्की हल्की घटाएं थीं। दौसा जिले के कुछ युवा भविष्य के सपनों से भरे दिल लिए जयपुर से परीक्षा देकर लौट रहे थे। शायद वे रास्ते में अपने करियर की बातें कर रहे थे—कौन किस विभाग में नौकरी करेगा, किसका चयन पहले होगा, कौन अपने गांव के नाम को रौशन करेगा…पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।
जयपुर-आगरा नेशनल हाईवे-21 पर कैलाई-दुब्बी गांव के पास, एक बेकाबू ट्रेलर लोहे के गार्डरों का बोझ लिए डिवाइडर लांघता हुआ आया और सामने से आ रही एक कार को रौंद गया।
कार में बैठे थे पांच ज़िंदगियों से भरे, उम्मीदों से लदे लोग। पर टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि कुछ ही पलों में वह कार एक मरे हुए लोहे के ढांचे में तब्दील हो गई।
कार चला रहे यादराम मीणा (36) की सांसें वहीं थम गईं। उनके बगल में बैठी मोनिका (18) — जो शायद अभी कॉलेज की परीक्षा के सवालों को याद कर रही थी — चुपचाप अनंत यात्रा पर निकल गई। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
पीछे की सीट पर बैठी थीं दो सगी बहनें — अर्चना और वेदिका। उनके साथ था मुकेश महावर। तीनों बुरी तरह घायल हो चुके थे। पर वे ज़िंदा थे… सांसें चल रही थीं… उम्मीद बाकी थी।
लोगों ने दौड़कर उन्हें कार से निकाला, खून में लथपथ तीनों को दौसा अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने हाथ खड़े किए — “जल्दी जयपुर ले जाइए।”
फिर शुरू हुई एक और दौड़ — ज़िंदगी को बचाने की दौड़… जो जाम में हार गई।
एंबुलेंस दौड़ी। सायरन चीखने लगा। पर जयपुर की घाट की गुणी टनल में उसे भीड़ ने रोक दिया। सायरन तो बजता रहा… पर किसी ने रास्ता नहीं दिया।
वेदिका की सांसें धीरे-धीरे थमने लगीं। अर्चना की आंखें धुंधलाने लगीं। मुकेश की धड़कनों ने हार मान ली।
जब एंबुलेंस अस्पताल पहुंची, डॉक्टरों ने सिर्फ इतना कहा — “अब कुछ नहीं बचा…”
सपनों के ताबूत और टूटे हुए घर
आज भजेड़ा गांव की गलियों में सन्नाटा है। महवा में लोग चुप हैं। जिन बहनों को पढ़ा-लिखाकर उनके माता-पिता समाज में एक मिसाल बनते देखना चाहते थे, वे आज ताबूत में लिपटी लौट आईं।
यादराम, जो गांव में बच्चों को पढ़ा रहा था, अब खुद एक अधूरी किताब बन चुका है।
मुकेश, जो हर परीक्षा में अव्वल आता था, अब किसी लिस्ट में नहीं रहेगा।
एक सवाल, जो हवा में तैर रहा है…
क्या ये मौतें सिर्फ एक हादसा थीं?
या फिर ये नतीजा थीं — उस सिस्टम का जो एंबुलेंस को जाम में छोड़ देता है?
उस रफ्तार का जो ट्रेलर को ब्रेक लगाना नहीं सिखा पाई?
उस लापरवाही का जो हर हादसे के बाद सिर्फ मुआवज़े की बात करती है?
आख़िर में… एक अधूरी यात्रा
ये पांच लोग सिर्फ एग्ज़ाम देकर नहीं लौट रहे थे…वे लौट रहे थे ज़िंदगी की सबसे अहम परीक्षा पास करके — मेहनत, संघर्ष और उम्मीद की। पर उनके लिए रास्ता वहीं खत्म हो गया — जहां सिस्टम ने रास्ता नहीं दिया।
और अब उनके पीछे रह गईं — अधूरी किताबें, कोचिंग की खाली कुर्सियाँ, स्कूल की रजिस्टर में उनके नाम, और मां-बाप की बुझी आंखें…
यह हादसा नहीं, एक चेतावनी है — हर उस सिस्टम के लिए जो जीवन से तेज़ रफ्तार को इजाज़त देता है।
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