रिश्वत का यह कैसा नंगा नाच! पुलिस के नाम पर दो करोड़ की दलाली और उदयपुर में सुशासन का ढोल

उदयपुर। हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था को किस दीमक ने चाट लिया है, इसका एक और घिनौना और शर्मनाक नमूना झीलों की नगरी उदयपुर में देखने को मिला है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने जो जाल बिछाया, उसमें दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेते हुए एक दलाल रंगे हाथों पकड़ा गया। यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है—पूरे दो करोड़ रुपये! और यह रिश्वत किसके नाम पर वसूली जा रही थी? राजस्थान पुलिस के सबसे संभ्रांत और संवेदनशील अंग कहे जाने वाले स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) के एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एडिशनल एसपी) मुकेश सोनी के नाम पर!

ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए कि जिस एसओजी का गठन गंभीर अपराधों, आतंकवाद, संगठित गिरोहों और बड़े घोटालों की कमर तोड़ने के लिए किया गया था, उसी जांच एजेंसी की आड़ में पीड़ितों को ‘राहत’ देने के नाम पर करोड़ों की उगाही की जा रही है? यह कैसी विडंबना है? रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं, तो आम आदमी न्याय की गुहार लगाने किसके चौखट पर जाएगा?

इस पूरे प्रहसन का सबसे दुखद और विचित्र पहलू इसका समय (टाइमिंग) है। जिस दिन उदयपुर में यह घूसकांड पकड़ा गया, ठीक उसी वक्त सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी उसी शहर में मौजूद थे। वे मंचों से करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं का लोकार्पण कर रहे थे, सुशासन के कसीदे पढ़ रहे थे और निकाय चुनावों में जीत हासिल करने वाले अपनी ही पार्टी के नेताओं की पीठ थपथपा रहे थे। एक तरफ मंच से भाषणों की गंगा बह रही थी और दूसरी तरफ चंद किलोमीटर दूर पुलिस महकमे के नाम पर दो करोड़ की दलाली का खुला खेल चल रहा था। क्या इससे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक पाखंड कोई और हो सकता है?

अब बताया जा रहा है कि दलाल सज्जन कुमार उर्फ टाटला तो सलाखों के पीछे है, लेकिन अधिकारी की भूमिका की ‘जांच’ हो रही है और ठिकानों पर छापे पड़ रहे हैं। हमारे देश में जब भी कोई बड़ा अफसर लपेटे में आता है, तो अक्सर जांच की ऐसी भूलभुलैया शुरू होती है जिसका सिरा कभी जनता के हाथ नहीं लगता। सवाल यह है कि एक मामूली दलाल की क्या मजाल कि वह किसी उच्च पुलिस अधिकारी की सहमति या शह के बिना सीधे दो करोड़ रुपये का सौदा कर ले?

अगर सरकार सचमुच भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के अपने दावों के प्रति गंभीर है, तो इस मामले में केवल दलाल की बलि चढ़ाकर फाइल बंद नहीं की जानी चाहिए। इसमें शामिल बड़े मगरमच्छों की गर्दन भी कानून के शिकंजे में आनी चाहिए। जब तक वर्दी और पद की आड़ में अपनी तिजोरियां भरने वाले ऐसे तत्वों को नज़ीर बनने वाली सज़ा नहीं मिलेगी, तब तक सुशासन का हर दावा महज़ एक कागज़ी शिगूफा बनकर रह जाएगा।

 

About Author

Leave a Reply