
जल का पवित्रिकरण केवल “रिवर फ्रंट” या “लेक फ्रंट” विकास से संभव नहीं : “घाट संस्कृति” को पुनर्जीवित करना आवश्यक
उदयपुर । सम्पूर्ण विश्व 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाता है। वर्ष 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसका आयोजन किया जा रहा है। प्रत्येक वर्ष इस दिवस की एक विशेष थीम निर्धारित की जाती है। इस वर्ष की थीम “वाटर एंड जेंडर” है, जो जल प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका को सशक्त बनाने पर केंद्रित है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 19 मार्च 2026 को जारी वर्ल्ड वाटर डवलपमेंट रिपोर्ट में जल और जेंडर समानता के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार सुरक्षित, सुलभ और किफायती जल उपलब्धता केवल मानव अधिकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और समावेशी विकास की आधारशिला है।
इस रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए जल विशेषज्ञ, विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि भारत की पारंपरिक जल व्यवस्था में पुरुषों, महिलाओं की समान भूमिका थी लेकिन पश्चिमी प्रभाव के कारण जल प्रबंधन समाज केंद्रित होने के बजाय सरकार केंद्रित हो गया । विश्व स्तर पर जल प्रबंधन एवं वितरण में महिलाओं की भागीदारी मात्र 20 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह और भी कम है।डॉ. मेहता ने कहा कि जल संरक्षण, प्रबंधन एवं संवर्धन के लिए भारतीय दृष्टिकोण और पारंपरिक प्रणालियों की पुनर्स्थापना अत्यंत आवश्यक है।
वे डॉ. दौलत सिंह कोठारी इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च एंड एजुकेशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे थे।कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्थान के संस्थापक डॉ. सुरेन्द्र सिंह पोखरना ने विश्व जल दिवस के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. कोठारी के जीवन परिचय एवं योगदान को प्रस्तुत किया।
डॉ. मेहता ने कहा कि वैश्विक स्तर पर 1 अरब से अधिक महिलाएँ अभी भी सुरक्षित पेयजल सेवाओं से वंचित हैं, जबकि लगभग 1.8 अरब लोगों को घर के भीतर जल उपलब्ध नहीं है। दो-तिहाई परिवारों में जल संग्रहण की जिम्मेदारी महिलाओं पर है, जिसके चलते वे प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ घंटे इस कार्य में व्यतीत करती हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 2.1 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से तथा 3.4 अरब लोग सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं से वंचित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जल संकट, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और कुप्रबंधन के कारण विश्व “ग्लोबल वाटर बैंकक्रप्सी” की ओर बढ़ रहा है।
भारतीय दृष्टिकोण को समाधानमूलक बताते हुए डॉ. मेहता ने कहा कि जल केवल रासायनिक सूत्र एच टू ओ नहीं है, बल्कि यह जीवन, संस्कृति और पारिस्थितिकी का आधार है। भारतीय परंपरा में जल को “जीवंत तत्व” माना गया है, जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन को प्रभावित करता है तथा प्रत्येक संस्कार और परंपरा में इसकी उपस्थिति रहती है।
उन्होंने बताया कि 1970 के बाद से लगभग 35 प्रतिशत आर्द्रभूमि (वेटलैंड) समाप्त हो चुकी हैं, जबकि ये पृथ्वी के केवल 6 प्रतिशत क्षेत्र में होते हुए भी 40 प्रतिशत जैव विविधता का आधार हैं। जल में दवाइयों के अवशेष, हार्मोन, औद्योगिक रसायन एवं घरेलू रसायन जल गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
डॉ. मेहता ने कहा कि जल का वास्तविक पवित्रिकरण केवल “रिवर फ्रंट” या “लेक फ्रंट” विकास से संभव नहीं है। इसके लिए “घाट संस्कृति” को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि घाट केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिस्थितिक चेतना के केंद्र हैं। घाटों पर होने वाली सामुदायिक गतिविधियाँ, स्वच्छता और अनुष्ठान जल को स्वच्छ बनाए रखने में सहायक होते हैं। यह परंपरा जल के प्रति श्रद्धा और जिम्मेदारी विकसित कर जलस्रोत संरक्षण को सुनिश्चित करती है।
डॉ मेहता ने कहा कि मानव, प्रकृति और जल के संबंध को समझे बिना कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती। जल संरक्षण के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सहभागिता, व्यवहार परिवर्तन और नैतिक मूल्यों का समावेश आवश्यक है। जल संकट का समाधान विज्ञान और आध्यात्मिकता के समन्वय से ही संभव है।
भारतीय शास्त्रों में निहित वैज्ञानिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए मेहता ने कहा कि “पंचमहाभूत दृष्टिकोण ” आधुनिक पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है, जबकि “यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे” का सिद्धांत समग्र विज्ञान और सिस्टम थिंकिंग को दर्शाता है। “चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा…” श्लोक व्यवहार विज्ञान ( बिहेवियर साइंस)और सुस्थिर, सतत विकास ( सस्टेनेबल डेवलपमेंट) की अवधारणाओं का आधार प्रस्तुत करता है। “माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या:” का सिद्धांत प्रकृति के प्रति आत्मीयता और जिम्मेदारी का संदेश देता है। वराहमिहिर द्वारा भूजल खोज के लिए दिए गए सूत्र आधुनिक भूजल विज्ञान से मेल खाते हैं।प्राचीन सरोवर, कुएँ और बावड़ियाँ जल संचयन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल आर्य ने जल संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन और प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाने का आह्वान किया।
अमृता देवी पर्यावरण नागरिक संस्थान के सचिव विनोद मेलाना ने सुरभि विहार चारागाह संरक्षण कार्यक्रम की जानकारी दी। दिल्ली के अनिल जैन ने नदी किनारे कुओं के माध्यम से भूजल संवर्धन की अवधारणा प्रस्तुत की।
इंडिया वाटर पार्टनरशिप की सचिव डॉ. वीणा खंडूरी ने कहा कि सर्व-सहभागिता से ही जल संकट का समाधान संभव है। अलर्ट संस्थान के जितेन्द्र मेहता ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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