
उदयपुर। कभी किसी ने सच ही कहा है – “कुछ लोग मरकर भी अमर हो जाते हैं।” उदयपुर के हीराबाग कॉलोनी निवासी और महाराणा प्रताप कृषि एवं अभियांत्रिकी विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अनुभाग अधिकारी श्री नाथुलाल चंडालिया ऐसे ही एक नाम बन गए हैं। उनके देहांत के बाद भी उनकी सोच, उनका संकल्प और उनका योगदान आज भी जीवित है—मेडिकल छात्रों के हाथों में, उनकी पढ़ाई में, और शायद आने वाले किसी मरीज की जान बचाने वाले ज्ञान में।

2014 में ही उन्होंने परिवार के समक्ष यह संकल्प लिया था कि वे मरणोपरांत अपनी देह दान करेंगे—न किसी दिखावे के लिए, न किसी शौर्य गाथा के लिए, बल्कि मानवता के नाम एक सच्ची सेवा के रूप में। और रविवार को जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो सोमवार सुबह उनकी अंतिम यात्रा न फूलों से सजी चिता की ओर नहीं, बल्कि ज्ञान और सेवा के सबसे पवित्र स्थल आरएनटी मेडिकल कॉलेज की ओर रवाना हुई।
उनकी पुत्री परिधि छाजेड़, दामाद पियूष छाजेड़, पत्नी चन्द्रकला चंडालिया, दोहित्री तन्वी और परिजन प्रकाश जैन एवं विजय घरबड़ा ने न केवल इस संकल्प को निभाया, बल्कि पूरे सम्मान और गरिमा के साथ अंतिम विदाई दी।

इस पूरे कर्म में एनाटॉमी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रवीणा ओझा और गीतांजलि हॉस्पिटल के पूर्व आचार्य डॉ. नरेंद्र मोगरा का विशेष योगदान रहा।
श्री नाथुलाल चंडालिया अब भले हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी देह अब किसी प्रयोगशाला में किताब बन चुकी है, किसी छात्र की सीख बन चुकी है और किसी डॉक्टर की दृष्टि का विस्तार बन चुकी है।

सचमुच, यह देहदान नहीं—यह जीवनदान है।
और चंडालिया साहब, अब आप शरीर नहीं—संस्कार हो गए हैं।
उनके इस प्रेरक कदम को हम सबको सलाम करना चाहिए।
About Author
You may also like
भीगी पलकें, थम गई सांसें : हर आंख में आंसू थे जब महासतिया की 425 साल पुरानी छतरियों के बीच हमेशा के लिए सो गईं मां… मुखाग्नि देते टूट पड़े लक्ष्यराज
उदयपुर कांग्रेस में पर्दे के पीछे की नूराकुश्ती : जब सिपहसालार ही जंग के मैदान से भाग खड़े हों
उदयपुर नगर निगम चुनाव: जो जीता वो ही सिकंदर… फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के कैमरे में कैद प्रत्याशियों और समर्थकों के चेहरे, पढ़िए कौन कितना खुश और क्यों
वार्ड नंबर 19 : परदे के पीछे का निर्देशक और प्रतिशत के लिहाज से सबसे बड़ी जीत
पर्दे के पीछे : विरासत, संस्कारों की जीत और वार्ड 33 में खिली नई धूप
