
पटना की गलियों से लेकर लंदन स्टॉक एक्सचेंज तक की यात्रा
सफलता के पीछे का अदृश्य संघर्ष
आज जब हम वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का नाम सुनते हैं, तो हमें कॉरपोरेट वर्ल्ड की चकाचौंध दिखाई देती है—लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनी, खनिजों की वैश्विक ट्रेडिंग, अरबों डॉलर की नेटवर्थ और औद्योगिक दुनिया में सशक्त प्रभाव। लेकिन जो चीज़ अक्सर छूट जाती है, वह है उनकी ज़िंदगी की वह पहली सीढ़ी, जिस पर उन्होंने नंगे पैर कदम रखा था।
अनिल अग्रवाल की कहानी सिर्फ एक बिज़नेस टाइकून बनने की कहानी नहीं है, यह उस भारत की भी कहानी है जहां छोटे शहरों के साधारण परिवारों से निकले लोग आज वैश्विक मंच पर देश का नाम रौशन कर रहे हैं।
पटना की गलियों में जन्मी उम्मीद
24 जनवरी 1954 को बिहार की राजधानी पटना के एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे अनिल अग्रवाल का जीवन संघर्षों से भरा था। उनके पिता एक छोटे स्तर पर एल्युमिनियम के बर्तन बनाने का काम करते थे। चार बच्चों का पालन-पोषण करना उनके लिए किसी युद्ध से कम नहीं था। माहौल ऐसा था जहां “सपना” भी एक लग्ज़री माना जाता था। अनिल अग्रवाल ने खुद स्कूल के बाद कॉलेज छोड़ने का निर्णय लिया और पिता के काम में हाथ बंटाने लगे।
इस निर्णय ने भले ही उन्हें पारंपरिक शिक्षा से दूर कर दिया हो, लेकिन व्यावहारिक ज्ञान और जुझारूपन की राह पर यह पहला कदम था।
मुंबई : सपनों की गाड़ी, संघर्ष का स्टेशन
सिर्फ 19 साल की उम्र में अनिल मुंबई आ पहुंचे—सपनों की नगरी, मगर उनके लिए यह एक अनजान रणभूमि थी। एक टिफिन, एक बिस्तर, और आंखों में बड़े-बड़े सपने। वहां किसी ने उनका स्वागत नहीं किया, कोई इंतजार नहीं कर रहा था। लेकिन यह वही शहर था जहां कोई भी व्यक्ति, अगर जिद कर ले, तो आसमान को छू सकता है।
मुंबई की पहली छवि उनके लिए काली-पीली टैक्सियों, डबल डेकर बसों और ऊंची इमारतों के रूप में दर्ज हुई। यह उनके जीवन की एक नई शुरुआत थी—जो आज लाखों युवाओं के लिए प्रतीक बन चुकी है कि किस तरह अकेले भी आगे बढ़ा जा सकता है।
कबाड़ से कारोबार तक : खुद की दुकान, खुद का रास्ता
भोईवाड़ा की मेटल मार्केट में किराये पर एक छोटी सी दुकान लेकर अनिल ने मेटल स्क्रैप का काम शुरू किया। कबाड़ बेचते-बेचते उन्होंने वह धातु देखी, जिससे सपनों का किला बनता है। 1970 के दशक में धातु की ट्रेडिंग शुरू करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे यह जाना कि मेटल सिर्फ कारोबार नहीं, एक बड़ी इंडस्ट्री का द्वार है।
पहली कंपनी, पहला जुआ
1976 में अनिल अग्रवाल ने दिवालिया हो चुकी शमशेर स्टर्लिंग केबल कंपनी खरीद ली। पर पैसे नहीं थे। लोन लेना पड़ा। नितिन काँटावाला जैसे वकील और दिनकर पाई जैसे बैंक मैनेजर की मदद से उन्होंने 16 लाख रुपये डाउन पेमेंट किया। यह उनका पहला बड़ा कदम था—जिसमें भावनाएं, डर, उम्मीद, और सपना—all-in-one पैक था।
उन्होंने खुद कहा था कि जब उन्होंने कंपनी के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए, उनकी आंखों में आंसू थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि यह एक रोलर कोस्टर की पहली चढ़ाई थी—अगले मोड़ पर उतराई थी।
असफलताओं की श्रृंखला और डिप्रेशन की गहराई
नई कंपनी, पुराना संकट। कंपनी चलाने के लिए पूंजी नहीं, कर्मचारियों को वेतन देने में परेशानी, और नौ अलग-अलग बिज़नेस—सबके सब नाकाम। एल्युमिनियम रॉड से लेकर मैगनेटिक वायर तक—हर दिशा में उन्होंने प्रयास किया, लेकिन असफलता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।
तीन साल तक अनिल अग्रवाल डिप्रेशन में रहे। लेकिन उन्होंने इसे दुनिया से छुपाए रखा। सुबह योग और मेडिटेशन से वे खुद को तैयार करते, और दिनभर बैंकों के चक्कर काटते। यह वह दौर था जब उनके पास सिनेमा की टिकट तक के पैसे नहीं होते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
सरकारी नीति बनी वरदान
1986 में भारत सरकार ने टेलीफोन केबल प्रोडक्शन के लिए प्राइवेट सेक्टर को मंजूरी दी। यह उनके लिए जैसे घने अंधेरे में रोशनी की किरण थी। उन्होंने तत्काल स्टरलाइट इंडस्ट्रीज़ की नींव रखी—एक ऐसी कंपनी जिसने न सिर्फ अनिल को डिप्रेशन से बाहर निकाला, बल्कि उन्हें भारत के टॉप उद्योगपतियों में शामिल कर दिया।
वेदांता : भारत से लेकर अफ्रीका तक का विस्तार
स्टरलाइट से शुरू हुई यह यात्रा आगे चलकर वेदांता रिसोर्सेज में तब्दील हुई। आज वेदांता समूह जिंक, तांबा, एल्युमिनियम, आयरन ओर, तेल और गैस जैसे खनिज संसाधनों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कार्य कर रहा है। भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया—हर कोने में अनिल अग्रवाल की कंपनियों की उपस्थिति है।
सामाजिक योगदान: सिर्फ मुनाफा नहीं, मिशन भी
अनिल अग्रवाल के लिए व्यापार सिर्फ लाभ का साधन नहीं है, यह समाज को लौटाने का माध्यम भी है। उन्होंने वेदांता फाउंडेशन की स्थापना की, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्रों में काम कर रहा है। उन्होंने 75% संपत्ति दान करने का संकल्प लिया है, जो उन्हें एक बड़े उद्योगपति से एक महानायक बनाता है।
अनिल अग्रवाल आज क्यों ज़रूरी हैं?
आत्मनिर्भर भारत के प्रतीक: वेदांता समूह ने “मेक इन इंडिया” को मजबूती दी है।
युवाओं के लिए प्रेरणा: संघर्ष से सफलता तक का उनका सफर आज भी लाखों युवाओं के लिए मार्गदर्शक है।
सस्टेनेबिलिटी और सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी: वेदांता का ज़ोर अब ग्रीन एनर्जी और स्थायी विकास पर है।
भविष्य के उद्योगों में निवेश: तकनीक, हरित खनन और शिक्षा क्षेत्र में वेदांता की योजनाएं भारत की आर्थिक रीढ़ बनने की क्षमता रखती हैं।
वह बच्चा जो कभी टिकट नहीं खरीद पाया था, आज अपनी फिल्मों की स्क्रिप्ट लिख रहा है
अनिल अग्रवाल की जीवनी हमें सिखाती है कि जीवन में कभी भी हार अंतिम नहीं होती—अगर इरादे जिंदा हों। एक छोटे शहर से आए इस नौजवान ने यह साबित कर दिखाया कि सपने बेशक किसी भी गली में जन्म लें, अगर उन्हें खुला आसमान मिले, तो वे आकाश छू सकते हैं।
आज जब हम अनिल अग्रवाल को देखते हैं—तो हम सिर्फ एक अरबपति नहीं देखते—हम एक ऐसा किरदार देखते हैं जिसकी आत्मकथा में हर वो मोड़ है, जो किसी भी आम इंसान को खास बना सकता है। और यही वजह है कि अनिल अग्रवाल सिर्फ एक नाम नहीं, एक प्रेरणा बन चुके हैं।
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