
मुंबई। 2020 और 2021 की त्रासदी के बाद भारत ने कोविड-19 की भयावहता को पीछे छोड़ दिया था। लेकिन 2025 की गर्मियों में, कोरोना वायरस की एक बार फिर धुंधली सी परछाई दिखने लगी है। महाराष्ट्र के ठाणे शहर में एक 21 वर्षीय युवक की कोविड-19 से मौत और नोएडा में 55 वर्षीय महिला का पॉज़िटिव पाया जाना इस बात का संकेत हैं कि कोरोना पूरी तरह गया नहीं है — वह केवल कमज़ोर पड़ा था।
ठाणे की घटना : एक युवा की दर्दनाक मौत
ठाणे नगर निगम के अनुसार, जिस युवक की 22 मई को गंभीर मधुमेह के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया था, उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि 23 मई को कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आने के कुछ ही घंटों बाद उसकी मौत हो गई। यह जानकारी बीबीसी मराठी ने साझा की है।
यह घटना कई सवाल उठाती है :
क्या कोविड फिर से ख़तरनाक हो रहा है?
क्या स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ फिर से अलर्ट मोड में जानी चाहिए?
क्या टीकाकरण और बूस्टर डोज़ पर्याप्त थे?
नोएडा में भी पॉज़िटिव केस: चेतावनी या सामान्य चक्र?
गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में 55 वर्षीय महिला के आरटी-पीसीआर टेस्ट में पॉज़िटिव पाए जाने की पुष्टि वहां के सीएमओ डॉ. नरेंद्र कुमार ने की। उन्होंने कहा कि “घबराने की जरूरत नहीं है”, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि सभी लॉजिस्टिक और टेस्टिंग संसाधन तैयार किए जा रहे हैं।
नोएडा में अब प्रशासन सतर्क मोड में है।
महाराष्ट्र में एक्टिव केस: मात्र 56 लेकिन क्या यह शुरुआत है?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, महाराष्ट्र में फिलहाल 56 सक्रिय कोविड केस हैं। यह संख्या देखने में बहुत कम लग सकती है, लेकिन जब किसी राज्य में एक युवा की मौत हो जाए, तो यह सिर्फ संख्या नहीं रह जाती — यह एक सिग्नल होता है।
क्या जेएन.1 वैरिएंट चिंता की वजह है?
जेएन.1 कोरोना वायरस का एक नया सब-वैरिएंट है जो ओमिक्रॉन परिवार से जुड़ा है। यह पहले दक्षिण एशिया, चीन, सिंगापुर, जापान में फैला और अब इसके मामले भारत में भी दर्ज होने लगे हैं।
इस वैरिएंट की विशेषताएं:
यह तेज़ी से फैलने में सक्षम है।
इसके लक्षण अक्सर पुराने वैरिएंट जैसे ही होते हैं — बुख़ार, गले में खराश, थकान, सूखी खांसी।
अभी तक इसकी वजह से मौतें दुर्लभ हैं, लेकिन कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले (जैसे डायबिटिक, बुज़ुर्ग) लोगों पर इसका असर गंभीर हो सकता है।
कोविड की थकान बनाम वास्तविक खतरा
पिछले तीन सालों में दुनिया ने कोविड से लड़ने में जो कुछ सीखा है, उसके चलते लोग अब थक चुके हैं — मास्क पहनना, सोशल डिस्टेंसिंग, वैक्सीनेशन की बार-बार चर्चा। लेकिन इस थकान के बावजूद, हमें यह समझना होगा कि:
कोविड गया नहीं है, वह रूप बदल रहा है।
नया वैरिएंट भले ही पहले जितना घातक न हो, लेकिन यदि जागरूकता नहीं रही, तो वह घातक बन सकता है।
युवाओं पर असर: एक नया अध्याय?
21 वर्षीय युवक की मौत यह दिखाती है कि अब संक्रमण केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं है। मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियाँ यदि युवा वर्ग में हैं, तो कोविड उनकी हालत और बिगाड़ सकता है।
सवाल यह नहीं कि केस कितने हैं, सवाल यह है कि तैयारी कैसी है?
हालांकि वर्तमान में केसों की संख्या बहुत कम है, लेकिन सवाल यह उठता है कि:
अस्पतालों की तैयारी क्या अभी भी वैसी ही है जैसी 2021 में थी?
टेस्टिंग क्षमता को फिर से बढ़ाने की ज़रूरत है या नहीं?
जनता को जागरूक करने का अभियान फिर से चलाया जाना चाहिए?
क्या करना चाहिए अब?
लक्षण दिखें तो टेस्ट जरूर कराएं — खासकर बुखार, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत हो।
मास्क का प्रयोग बंद न करें, खासकर अस्पताल, भीड़-भाड़ वाले इलाके या सार्वजनिक परिवहन में।
टीकाकरण की स्थिति जांचें — यदि आपने बूस्टर नहीं लिया है, तो डॉक्टर से सलाह लें।
कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले मरीज (डायबिटिक, अस्थमा, हृदय रोगी) विशेष सतर्कता बरतें।
सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करें, चाहे वह छोटा सा अपडेट ही क्यों न हो।
निष्कर्ष: डर नहीं, जागरूकता ज़रूरी
ठाणे में एक युवा की मौत और नोएडा में नए केस आने के बाद यह स्पष्ट है कि कोरोना वायरस अभी खत्म नहीं हुआ है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें डर में जीना चाहिए। इसका मतलब है कि हमने जो सबक सीखे थे, उन्हें भूलना नहीं चाहिए।
यह वायरस हमें एक बार फिर याद दिला रहा है कि लापरवाही नहीं, समझदारी ही हमारी सबसे बड़ी ढाल है।
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